अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ * अग्निपुराण *
'श्रीयन्ती०' आदि मन्त्रसे श्री-प्रतिमाको शय्यापर शयन करावे। फिर श्रीसूक्तसे संनिधिकरण करे और लक्ष्मी (श्री) बीज (श्रीं)-से चित्-शक्तिका विन्यास करके पुनः अर्चना करे। इसके बाद श्रीसूक्तसे मण्डपस्थ कुण्डोंमें कमलों अथवा करवीर-पुष्पोंका हवन करे। होमसंख्या एक हजार या एक सौ होनी चाहिये। गृहोपकरण आदि समस्त पूजन-सामग्री आदितः श्रीसूक्तके मन्त्रोंसे ही समर्पित करे। फिर पूर्ववत् पूर्णरूपसे प्रासाद-संस्कार सम्पन्न करके माता लक्ष्मीके लिये पिण्डिका-निर्माण करे। तदनन्तर उस पिण्डिकापर लक्ष्मीकी प्रतिष्ठा करके श्रीसूक्तसे संनिधिकरण करते हुए, पूर्ववत् उसकी प्रत्येक ऋचाका जप करे॥ ९—१२॥
मूल-मन्त्रसे चित्-शक्तिको जाग्रत् करके पुनः संनिधिकरण करे। तदनन्तर आचार्य और ब्रह्मा तथा अन्य ऋत्विज् ब्राह्मणोंको भूमि, सुवर्ण, वस्त्र, गौ एवं अन्नादिका दान करे। इस प्रकार सभी देवियोंकी स्थापना करके मनुष्य राज्य और स्वर्ग आदिका भागी होता है॥ १३-१४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'लक्ष्मी आदि देवियोंकी प्रतिष्ठाके सामान्य विधानका वर्णन' नामक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६२॥
तिरसठवाँ अध्याय
विष्णु आदि देवताओंकी प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि तथा पुस्तक-लेखन-विधि
श्रीभगवान् कहते हैं— इस प्रकार विनतानन्दन गरुड, सुदर्शनचक्र, ब्रह्मा और भगवान् नृसिंहकी प्रतिष्ठा भी उनके अपने-अपने मन्त्रसे श्रीविष्णुकी ही भाँति करनी चाहिये; इसका श्रवण करो॥ १॥
'ॐ सुदर्शन महाचक्र शान्त दुष्टभयंकर, छिन्धिच्छिन्धि भिन्धि भिन्धि विदारय विदारय परमन्त्रान् ग्रस ग्रस भक्षय भक्षय भूतांस्त्रासय त्रासय हुं फट् सुदर्शनाय नमः।'
इस मन्त्रसे चक्रका पूजन करके वीर पुरुष युद्धक्षेत्रमें शत्रुओंको विदीर्ण कर डालता है॥ २-३॥
'ॐ क्षौं नरसिंह उग्ररूप ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल स्वाहा।'
यह नरसिंहभगवान्का मन्त्र है। अब मैं तुमको पाताल-नृसिंह-मन्त्रका उपदेश करता हूँ—॥ ४-५॥
'ॐ क्षौं नमो भगवते नरसिंहाय प्रदीप्तसूर्य-कोटिसहस्रसमतेजसे वज्रनखदंष्ट्रायुधाय स्फुटविकट-विकीर्णकेसरसटाप्रक्षुभितमहार्णवाम्भोदुन्दुभिनिर्घोषाय सर्वमन्त्रोत्तारणाय एहोहि भगवन्नरसिंह पुरुष परापर ब्रह्म सत्येन स्फुर स्फुर विजृम्भ विजृम्भ आक्रम आक्रम गर्ज गर्ज मुञ्च मुञ्च सिंहनादं विदारय विदारय विद्रावय विद्रावयाऽऽविशाऽऽविश सर्वमन्त्ररूपाणि मन्त्रजातींश्च हन हन छिन्दच्छिन्द संक्षिप संक्षिप दर दर दारय दारय स्फुट स्फुट स्फोटय स्फोटय ज्वालामालासंघातमय सर्वतोऽनन्तज्वालावज्राशनिचक्रेण सर्वपातालानुत्सादयोत्सादय सर्वतोऽनन्तज्वालावज्रशरपञ्जरेण सर्वपातालान्यनिवारय परिवारय सर्वपातालासुरवासिनां हृदयान्याकर्षयाऽऽकर्षय शीघ्रं दह दह पच पच मथ मथ शोषय शोषय निकृन्तय निकृन्तय तावद्यावन्मे वशमागताः पातालेभ्यः ( फट्सुरेभ्यः फण्मन्त्ररूपेभ्यः फण्मन्त्रजातिभ्यः फट् संशयान्मां भगवन्नरसिंहरूप विष्णो सर्वापद्भ्यः ) सर्वमन्त्ररूपेभ्यो रक्ष रक्ष हुं फण्ममो नमस्ते॥ ६॥'