अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ * अग्निपुराण *
सड़सठवाँ अध्याय
जीर्णोद्धार-विधि
**श्रीभगवान् कहते हैं—**ब्रह्मन्! अब मैं जीर्णोद्धारकी विधि बतलाता हूँ। आचार्य मूर्तिको विभूषित करके स्नान करावे। अत्यन्त जीर्ण, अङ्गहीन, भग्न तथा शिलामात्रावशिष्ट (विशेष चिह्नसे रहित) प्रतिमाका परित्याग करे। उसके स्थानपर पूर्ववत् देवगृहमें नवीन स्थिर-मूर्तिका न्यास करे। आचार्य वहाँपर (भूतशुद्धि-प्रकरणमें उक्त) संहारविधिसे सम्पूर्ण तत्त्वोंका संहार करे। गुरु नृसिंह-मन्त्रकी सहस्र आहुतियाँ देकर मूर्तिको उखाड़ दे। फिर दारुमयी मूर्तिको अग्निमें जला दे, प्रस्तरनिर्मित विसर्जित प्रतिमाको जलमें फेंक दे, धातुमयी या रत्नमयी मूर्ति हो तो उसे समुद्रकी अगाध जलराशिमें विसर्जित कर दे। जीर्णाङ्ग प्रतिमाको यानपर आरूढ़ कर, वस्त्र आदिसे आच्छादित करके, गाजे-बाजेके साथ ले जाय और जलमें छोड़ दे। फिर आचार्यको दक्षिणा दे। उसी दिन पूर्व प्रतिमाके प्रमाण तथा द्रव्यके अनुसार उसी प्रमाणकी मूर्ति स्थापित करे। इसी प्रकार कूप, वापी और तड़ाग आदिका जीर्णोद्धार करनेसे भी महान् फलकी प्राप्ति होती है॥ १–६॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'जीर्णोद्धारविधि-कथन' नामक सड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६७॥
अड़सठवाँ अध्याय
उत्सव-विधिका कथन
श्रीभगवान् कहते हैं— अब मैं उत्सवकी विधिका वर्णन करता हूँ। देवस्थापन होनेके पश्चात् उसी वर्षमें एकरात्र, त्रिरात्र या अष्टरात्र उत्सव मनावे; क्योंकि उत्सवके बिना देवप्रतिष्ठा निष्फल होती है। अयन या विषुव-संक्रान्तिके समय शयनोपवन या देवगृहमें अथवा कर्ताके जिस प्रकार अनुकूल हो, भगवान्की नगरयात्रा करावे। उस समय मङ्गलाङ्कुरोंका रोपण, नृत्य-गीत तथा गाजे-बाजेका प्रबन्ध करे। अङ्कुरोंके रोपणके लिये शराव (परई) या हँडिया श्रेष्ठ मानी गयी हैं। यव, शालि, तिल, मुद्ग, गोधूम, श्वेत सर्षप, कुलत्थ, माष और निष्पावको प्रक्षालित करके वपन करे। प्रदीपोंके साथ रात्रिमें नगरभ्रमण करते हुए इन्द्रादि दिक्पालों, कुमुद आदि दिग्गजों तथा सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंके उद्देश्यसे पूर्वादि दिशाओंमें बलि-प्रदान करे। जो मनुष्य देवबिम्बका वहन करते हुए देवयात्राका अनुगमन करते हैं, उनको पद-पदपर अश्वमेध यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है॥ १–६ $\frac{१}{२}$॥
आचार्य पहले दिन देवमन्दिरमें आकर देवताको सूचित करे—'भगवन्! देवश्रेष्ठ! आपको कल तीर्थयात्रा करनी है। सर्वज्ञ! आप उसका आरम्भ करनेकी आज्ञा देनेमें सदा समर्थ हैं।' देवताके सम्मुख इस प्रकार निवेदन करके उत्सव-कार्यका आरम्भ करे। चार स्तम्भोंसे युक्त मङ्गलाङ्कुरोंकी घटिकासे समन्वित तथा विभूषित वेदिकाके समीप जाय। उसके मध्यभागमें स्वस्तिकपर प्रतिमाका न्यास करे। काम्य अर्थको लिखकर चित्रोंमें स्थापित करके अधिवासन करे॥ ७–१०॥
फिर विद्वान् पुरुष वैष्णवोंके साथ मूल-मन्त्रसे देवमूर्तिके अङ्गोंमें घृतका लेपन करे तथा सारी रात घृतधारासे अभिषेक करे। देवताको दर्पण दिखलाकर, आरती, गीत, वाद्य आदिके