भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 878 में से

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पृष्ठ 174
  • अध्याय ७४ * १४७

पूरक प्राणायामद्वारा चैतन्यभाव जाग्रत् किया गया है। शिखाके ऊपर 'हूं' का न्यास करके शुद्ध बिन्दुस्वरूप जीवका चिन्तन करे। फिर कुम्भक-प्राणायाम करके उस एकमात्र चैतन्य-गुणसे युक्त जीवको शिवके साथ संयुक्त कर दे॥ ११-१५॥

इस तरह शिवमें लीन होकर साधक सबीज रेचक प्राणायामद्वारा शरीरगत भूतोंका शोधन करे। अपने शरीरमें पैरसे लेकर बिन्दु-पर्यन्त सभी तत्त्वोंका विलोम-क्रमसे चिन्तन करे। बिन्दुरूप जीवको बिन्द्वन्त लीन करके पृथ्वी और वायुका एक-दूसरेमें लय करे। साथ ही अग्नि एवं जलका भी परस्पर विलय करे। इस प्रकार दो-दो विरोधी भूतोंका परस्पर शोधन (लय) करना चाहिये। आकाशका किसीसे विरोध नहीं है; इस भूत-शुद्धिका विशेष विवरण सुनो—भूमण्डलका स्वरूप चतुष्कोण है। उसका रंग सुवर्णके समान पीला है। वह कठोर होनेके साथ ही वज्रके चिह्नसे तथा 'हां'¹ इस आत्मीय बीज (भूबीज)-से युक्त है। उसमें 'निवृत्ति' नामक कला है। (शरीरमें पैरसे लेकर घुटनेतक भूमण्डलकी स्थिति है।) इसी तरह पैरसे लेकर मस्तक-पर्यन्त क्रमशः पाँचों भूतोंका चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार पाँच गुणोंसे युक्त वायुभूत भूमण्डलका चिन्तन करे॥ १६-१९॥

जलका स्वरूप अर्धचन्द्राकार है। वह द्रवस्वरूप है, चन्द्रमण्डलमय है। उसकी कान्ति या वर्ण उज्ज्वल है। वह दो कमलोंसे चिह्नित है। 'ह्रीं'² इस बीजसे युक्त है। 'प्रतिष्ठा' नामक कलाके स्वरूपको प्राप्त है। वह वामदेव तथा तत्पुरुष-मन्त्रोंसे संयुक्त जलतत्त्व चार गुणोंसे युक्त है। उसे इस प्रकार (घुटनेसे नाभितक जलका) चिन्तन करते हुए उस जल-तत्त्वका वह्निस्वरूपमें लीन करके शोधन करे। अग्निमण्डल त्रिकोणाकार है। उसका वर्ण लाल है। (नाभिसे हृदयतक उसकी स्थिति है।) वह स्वस्तिकके चिह्नसे युक्त है। उसमें 'हूं'³ बीज अङ्कित है। वह विद्याकला-स्वरूप है। उसका अघोर मन्त्र है तथा वह तीन गुणोंसे युक्त एवं जलभूत है—इस प्रकार चिन्तन करते हुए अग्नितत्त्वका शोधन करे। वायुमण्डल षट्कोणाकार है। (शरीरमें हृदयसे लेकर भौंहोंके मध्य भागतक उसकी स्थिति है।) वह छः बिन्दुओंसे चिह्नित है। उसका रंग काला है। वह 'हैं'⁴ बीज एवं सद्योजात-मन्त्रसे युक्त और शान्तिकला-स्वरूप है। उसमें दो गुण हैं तथा वह पृथ्वीभूत है। इस प्रकार चिन्तन करते हुए वायुतत्त्वका शोधन करे॥ २०-२४॥

आकाशका स्वरूप व्योमाकार, नाद-बिन्दुमय, गोलाकार, बिन्दु और शक्तिसे विभूषित तथा शुद्ध स्फटिक मणिके समान निर्मल है। (शरीरमें भ्रूमध्यसे लेकर ब्रह्मरन्ध्रतक उसकी स्थिति है।) वह 'हौं फट्'⁵ इस बीजसे युक्त है। शान्त्यतीतकलामय⁶ है। एक गुणसे युक्त तथा परम विशुद्ध है। इस प्रकार चिन्तन करते हुए आकाश-तत्त्वका शोधन करे। तदनन्तर अमृतवर्षी मूलमन्त्रसे सबको परिपुष्ट करे। तत्पश्चात् आधारशक्ति, कूर्म, अनन्त (पृथ्वी)-की पूजा करे। फिर पीठ (चौकी)-के अग्निकोणवाले पायेमें धर्मकी, नैर्ऋत्य कोणवाले पायेमें ज्ञानकी, वायव्यकोणमें वैराग्यकी और ऐशान्यकोणमें ऐश्वर्यकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद पीठकी पूर्वादिशाओंमें क्रमशः अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्यकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद पीठके मध्यभागमें कमलकी पूजा करे। इस प्रकार मन-ही-मन इस पीठवर्ती कमलमय


१. अन्य तन्त्रोंके अनुसार पृथ्वीका अपना बीज 'लं' है। २. जलका बीज 'वं' है। यही ग्रन्थान्तरोंसे सिद्ध है। ३. अग्निका मुख्य बीज 'रं' है। ४. वायुका बीज 'यं' है। ५. आकाशका बीज 'हं' है—यही सर्वसम्मत है। ६. शान्त्यतीतकलाके भीतर इन्धिका, दीपिका, रेचिका और मोचिका—ये चार कलाएँ आती हैं।

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