भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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१६२ * अग्निपुराण *


करके उनका पूजन करे। 'हां शान्तिकला-द्वाराय नमः।' 'हां विद्याकलाद्वाराय नमः।' 'हां निवृत्तिकलाद्वाराय नमः।' 'हां प्रतिष्ठाकलाद्वाराय नमः।'—इन मन्त्रोंसे पूर्वादि चारों द्वारोंका पूजन करना चाहिये। प्रत्येक द्वारकी दक्षिण और वाम शाखाओंपर दो-दो द्वारपालोंका पूजन करे। पूर्वमें 'नन्दिने नमः।' 'महाकालाय नमः।'—इन मन्त्रोंसे नन्दी और महाकालका, दक्षिणमें 'भृङ्गिणे नमः।' 'गणाय नमः।'—इन मन्त्रोंसे भृङ्गी और गणका, पश्चिममें 'वृषभाय नमः।' 'स्कन्दाय नमः।'—इन मन्त्रोंसे नन्दिकेश्वर वृषभ तथा स्कन्दका तथा उत्तर द्वारमें 'देव्यै नमः।' 'चण्डाय नमः।'—इन मन्त्रोंसे देवी तथा चण्ड नामक द्वारपालका क्रमशः पूजन करे॥ १९—२२॥

इस प्रकार द्वारपाल आदिकी 'नित्य' पूजा करके पश्चिम द्वारसे होकर याग-मन्दिरमें प्रवेश करे। फिर वास्तुदेवताका पूजन करके भूतशुद्धि करे। तत्पश्चात् विशेषार्घ्य हाथमें लेकर अपनेमें शिवस्वरूपकी भावना करते हुए पूजा-सामग्रीका प्रोक्षण आदि करके यज्ञभूमिका संस्कार करे। फिर कुश, दूर्वा और फूल आदि हाथमें लेकर 'नमः' आदिके उच्चारणपूर्वक उसे अभिमन्त्रित करे। इस प्रकार शिवहस्तका विधान करके उसे अपने सिरपर रखे और यह भावना करे कि 'मैं सबका आदि कारण सर्वज्ञ शिव हूँ तथा यज्ञमें मेरी ही प्रधानता है।' इस प्रकार आचार्य भगवान् शिवका अत्यन्त ध्यान करे और ज्ञानरूपी खड्ग हाथमें लिये नैर्ऋत्य दिशामें जाकर उत्तराभिमुख हो अर्घ्यका जल छोड़े तथा यज्ञ-मण्डपमें चारों ओर पञ्चगव्य छिड़के। चतुष्पथान्त संस्कार और उत्तम संस्कारयुक्त वीक्षण आदिके द्वारा वहाँ सब ओर गौर सर्षप आदि बिखेरने योग्य वस्तुओंको बिखेरकर कुशनिर्मित कूर्चके द्वारा उनका उपसंहार करे। फिर उनके द्वारा ईशानकोणमें वर्धनी एवं कलशकी स्थापनाके लिये आसनकी कल्पना करे॥ २३-२८॥

तत्पश्चात् नैर्ऋत्यकोणमें वास्तुदेवताका तथा द्वारपर लक्ष्मीका पूजन करे। फिर पश्चिमाभिमुख कलशको सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करके प्रणवके उच्चारणपूर्वक यह भावना करे कि 'यह शिवस्वरूप कलश नन्दिकेश्वर वृषभके ऊपर आरूढ़ है।' साथ ही वर्धनी सिंहके ऊपर स्थित है, ऐसी भावना करे। कलशपर साङ्ग भगवान् शिवकी और वर्धनीमें अस्त्रकी पूजा करे। इसके बाद पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्र आदि दिक्पालोंका तथा मण्डपके मध्यभागमें ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव आदिका पूजन करे। तत्पश्चात् कलशके पृष्ठभागका अनुसरण करनेवाली वर्धनीको भलीभाँति हाथमें लेकर मन्त्रज्ञ गुरु भगवान् शिवकी आज्ञा सुनावे। फिर पूर्वसे लेकर प्रदक्षिणक्रमसे चलते हुए ईशानकोणतक जलकी अविच्छिन्न धारा गिरावे और मूलमन्त्रका उच्चारण करे। शस्त्ररूपिणी वर्धनीको यज्ञमण्डपकी रक्षाके लिये उसके चारों ओर घुमावे। पहले कलशको आरोपित करके उसके वामभागमें शस्त्रके लिये वर्धनीको स्थापित करे॥ २९-३३॥

उत्तम एवं सुस्थिर आसनवाले कलशपर भगवान् शंकरका तथा प्रणवपर स्थित हुई वर्धनीमें उनके आयुधका पूजन करे। तदनन्तर उन दोनोंका लिङ्गमुद्राके द्वारा परस्पर संयोग कराकर भगलिङ्ग-संयोगका सम्पादन करे। कलशपर ज्ञानरूपी खड्ग अर्पित करके मूल-मन्त्रका जप करे। उस जपके दशांश होमसे वर्धनीमें रक्षा घोषित करे। फिर वायव्यकोणमें गणेशजीकी पूजा करके पञ्चामृत आदिसे भगवान् शिवको स्नान करावे और पूर्ववत् पूजन करके कुण्डमें शिवस्वरूप अग्निकी पूजा करे। इसके बाद विधिपूर्वक चरु तैयार करके उसे सम्पाताहुतिकी विधिसे शोधित करे।