भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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१६ * अग्निपुराण *

(अग्नि० २७२। १)। अतः भगवान् अग्निदेवने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, अर्थात् अष्टाङ्गयोगका वर्णन किया, जिससे आत्मा परमात्मचैतन्यरूप हो जाय। परमात्म-चैतन्यकी प्राप्ति ही परम प्राप्तव्य है। इसीकी प्राप्तिके दो प्रधान मार्ग—ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठाका प्रतिपादन करनेवाली श्रीमद्भगवद्गीताका संक्षेपमें कथन करनेके उपरान्त यमगीताका भी वर्णन किया गया है।

वस्तुतः शरीरसे आत्मा पृथक् है। नेत्र, मन, बुद्धि आदि आत्मा नहीं हैं। आत्मा इनका नहीं, ये आत्माके हैं। जीवात्मा परमात्माका सनातन अंश है। ब्रह्मत्वकी प्राप्तिमें ही जीवनकी परम सफलता है। इसके लिये ज्ञानयोग श्रेष्ठ साधन है। साधनाके द्वारा जीव जगत्के स्थूल-सूक्ष्म बन्धनोंसे मुक्त होकर ब्रह्मत्वकी प्राप्ति कर लेता है। साधकको ‘शरीर-भाव’ से अतीत होना आवश्यक है। अपवादकी बात दूसरी है। अन्यथा सभीको अभ्यास करना ही पड़ता है। इसीलिये पूजा, व्रत, तप, वैराग्य और देवाराधनका विधान है। आत्मोत्कर्षके लिये सभीको अपने-अपने स्तरके अनुकूल साधन-पथ चुनना चाहिये। सभीका स्तर एक नहीं, अतः सभीका अधिकार भी समान नहीं। देवोपासनासे भी परमतत्त्वकी प्राप्ति हो सकती है। देवोपासकोंका जो ‘विष्णु’ है, वही याज्ञिकोंका ‘यज्ञपुरुष’ है और वही ज्ञानियोंका ‘मूर्तिमान् ज्ञान’ है। जीवात्मा किसी पथका आश्रय ले, अन्तिम उद्देश्य यही है कि आत्मा और परमात्माका एकत्व प्रकाशित हो जाय। सच्चा श्रेय तो सदा परमार्थमें ही निहित रहता है। परमार्थकी दृष्टिसे तो आत्मा और परमात्माका नित्य अभिन्नत्व है। अग्निपुराणमें श्रीसूतजीने कहा है—‘भगवान् विष्णु ही सारसे भी सार तत्त्व हैं। वे सृष्टि और पालन आदिके कर्ता और सर्वत्र व्यापक हैं।’ ‘वह विष्णुस्वरूप ब्रह्म मैं ही हूँ’—इस प्रकार उन्हें जान लेनेपर सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है।'

ऐसे वेदसम्मत, सर्वविद्यायुक्त और ब्रह्मस्वरूप अग्निपुराणका जो पठन, श्रवण, अध्ययन और मनन करता है उसे भोग और मोक्ष—दोनोंकी ही प्राप्ति होती है—

सारात्सारो हि भगवान् विष्णुः सर्गादिकृद्विभुः।
ब्रह्माहमस्मि तं ज्ञात्वा सर्वज्ञत्वं प्रजायते॥
(अग्नि० १। ४)