भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

* अध्याय ८३ * १७९

तिरासीवाँ अध्याय

निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत अधिवासनकी विधि

भगवान् शंकर कहते हैं—षडानन स्कन्द ! तदनन्तर निर्वाण-दीक्षामें पाशबन्धन-शक्तिके लिये और ताड़न आदिके लिये मूल-मन्त्र आदिका दीपन करे। उस समय प्रत्येकके लिये एक-एक या तीन-तीन आहुति देकर मन्त्रोंका दीपन-कर्म सम्पन्न करे। आदिमें प्रणव और अन्तमें 'हूं फट्' लगाकर बीचमें बीज, गर्भ एवं शिखाबन्ध-स्वरूप तीन 'हूं' का उच्चारण करे। इससे मूल-मन्त्रका दीपन होता है, यथा—'ॐ हूं हूं हूं हूं फट्।' इसीसे हृदयका दीपन होता है। यथा—'ॐ हूं हूं हूं हूं फट् हृदयाय नमः।' फिर 'ॐ हूं हूं हूं हूं फट् शिरसे स्वाहा।' आदि कहकर सिर आदि अङ्गोंका दीपन करे। समस्त क्रूर कर्मोंमें इसी तरह मूलादिका दीपन करना उचित है। शान्तिकर्म, पुष्टिकर्म और वशीकरणमें आदिगत प्रणव-मन्त्रके अन्तमें 'वषट्' जोड़कर उसी मन्त्रद्वारा प्रत्येकका दीपन करे। 'वषट्' और 'वौषट्' से युक्त तथा सम्पूर्ण काम्य-कर्मोंके ऊपर स्थित शम्बर-मन्त्रोंद्वारा आप्यायन आदि सभी कर्मोंमें हवन करना चाहिये॥ १–५॥

तत्पश्चात् अपने वामभागमें स्थित और मण्डलमें विराजमान शुद्ध शरीरवाले शिष्यका पूजन करके, एक उत्तम सूत्रमें सुषुम्णा नाड़ीकी भावना करके, मूल-मन्त्रसे उसको शिखाबन्धतक ले जाकर, वहाँसे फिर पैरोंके अंगूठेतक ले आवे। तत्पश्चात् संहार-क्रमसे उसे पुनः मुमुक्षु शिष्यकी शिखाके समीप ले जाय और वहीं उसे बाँध दे। पुरुषके दाहिने भागमें और नारीके वामभागमें उस सूत्रको नियुक्त करना चाहिये। इसके बाद शिष्यके मस्तकपर शक्तिमन्त्रसे पूजित शक्तिको संहारमुद्राद्वारा लाकर उक्त सूत्रमें उसी मन्त्रसे जोड़ दे। सुषुम्णा नाड़ीको लेकर मूल-मन्त्रसे उसका सूत्रमें न्यास करे और हृदय-मन्त्रसे उसकी पूजा करे। तदनन्तर कवच-मन्त्रसे अवगुण्ठित करके हृदय-मन्त्रद्वारा तीन आहुतियाँ दे। ये आहुतियाँ नाड़ीके संनिधानके लिये दी जाती हैं। शक्तिके संनिधानके लिये भी इसी तरह आहुति देनेका विधान है॥ ६–१०॥

तदनन्तर 'ॐ हां तत्त्वाध्वने नमः।', 'ॐ हां पदाध्वने नमः।', 'ॐ हां वर्णाध्वने नमः।', 'ॐ हां मन्त्राध्वने नमः।', 'ॐ हां कलाध्वने नमः।', 'ॐ हां भुवनाध्वने नमः।'—इन मन्त्रोंसे पूर्वोक्त सूत्रमें छः प्रकारके अध्वाओंका न्यास करके अस्त्र-मन्त्रद्वारा अभिमन्त्रित जलसे शिष्यका प्रोक्षण करे। फिर अस्त्र-मन्त्रके जपपूर्वक पुष्प लेकर उसके द्वारा शिष्यके हृदयमें ताड़न करे। इसके बाद हुंकारयुक्त रेचक प्राणायामके योगसे वहाँ शिष्यके शरीरमें प्रवेश करके, उसके भीतर हंस-बीजमें स्थित जीवचैतन्यको अस्त्र-मन्त्र पढ़कर वहाँसे विलग करे। इसके बाद 'ॐ हः हूं फट्।' इस शक्तिसूत्रसे तथा 'हां हां स्वाहा।' इस मन्त्रसे संहारमुद्राद्वारा उक्त नाड़ीभूत सूत्रमें उस विलग हुए जीवचैतन्यको नियुक्त करे। 'ॐ हां हां हामात्मने नमः।' इस मन्त्रका जप करते हुए जीवात्माके व्यापक होनेकी भावना करे। फिर कवच-मन्त्रसे उसका अवगुण्ठन करे और उसके सांनिध्यके लिये हृदय-मन्त्रसे तीन बार आहुतियाँ दे॥ ११–१८॥

तत्पश्चात् विद्यादेहका न्यास करके उसमें शान्त्यतीतकलाका अवलोकन करे। उस कलाके अन्तर्गत इतर तत्त्वोंसे युक्त आत्माका चिन्तन करे। 'ॐ हूं शान्त्यतीतकलापाशाय नमः।' इस मन्त्रसे उक्त कलाका अवलोकन करे। दो तत्त्व, एक मन्त्र, एक पद, सोलह वर्ण, आठ भुवन, क, ख आदि बीज और नाड़ी, दो कलाएँ, विषय, गुण और एकमात्र कारणभूत सदाशिव—इन सबका श्वेतवर्णा शान्त्यतीतकलामें अन्तर्भाव करके 'ॐ हूं शान्त्यतीतकलापाशाय हूं फट्।'