अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ८४ * १८३
४४. महाबल, ४५. श्वेत, ४६. जयभद्र, ४७. दीर्घबाहु, ४८. जलान्तक, ४९. वडवास्य, ५०. भीम—ये दस रुद्र वरुणदिशामें स्थित बताये गये हैं। ५१. शीघ्र, ५२. लघु, ५३. वायुवेग, ५४. सूक्ष्म, ५५. तीक्ष्ण, ५६. क्षमान्तक, ५७. पञ्चान्तक, ५८. पञ्चशिख, ५९. कपर्दी, ६०. मेघवाहन—ये दस रुद्र वायव्यकोणमें स्थित हैं। ६१. जटामुकुटधारी, ६२. नानारत्नधर, ६३. निधीश, ६४. रूपवान्, ६५. धन्य, ६६. सौम्यदेह, ६७. प्रसादकृत्, ६८. प्रकाम, ६९. लक्ष्मीवान्, ७०. कामरूप—ये दस रुद्र उत्तर दिशामें स्थित हैं। ७१. विद्याधर, ७२. ज्ञानधर, ७३. सर्वज्ञ, ७४. वेदपारग, ७५. मातृवृत्त, ७६. पिङ्गाक्ष, ७७. भूतपाल, ७८. बलिप्रिय, ७९. सर्वविद्याविधाता, ८०. सुख-दुःखकर—ये दस रुद्र ईशानकोणमें स्थित हैं। ८१. अनन्त, ८२. पालक, ८३. धीर, ८४. पातालाधिपति, ८५. वृष, ८६. वृषधर, ८७. वीर, ८८. ग्रसन, ८९. सर्वतोमुख, ९०. लोहित—इन दस रुद्रोंकी स्थिति नीचेकी दिशा पाताललोकमें समझनी चाहिये। ९१. शम्भु, ९२. विभु, ९३. गणाध्यक्ष, ९४. त्र्यक्ष, ९५. त्रिदशवन्दित, ९६. संवाह, ९७. विवाह, ९८. नभ, ९९. लिप्सु, १००. विचक्षण—ये दस रुद्र ऊर्ध्व दिशामें विराजमान हैं। १०१. हूहूक, १०२. कालाग्निरुद्र, १०३. हाटक, १०४. कूष्माण्ड, १०५. सत्य, १०६. ब्रह्मा, १०७. विष्णु तथा १०८. रुद्र—ये आठ रुद्र ब्रह्माण्ड-कटाहके भीतर स्थित हैं। यह स्मरण रखना चाहिये कि इन्हींके नामपर एक सौ आठ भुवनोंके भी नाम हैं॥ १२-२५॥
(१) सद्भावेश्वर, (२) महातेजः, (३) योगाधिपते, (४) मुञ्च मुञ्च, (५) प्रमथ प्रमथ, (६) शर्व शर्व, (७) भव भव, (८) भवोद्भव, (९) सर्वभूतसुखप्रद, (१०) सर्वसांनिध्यकर, (११) ब्रह्मविष्णुरुद्रपर, (१२) अनर्चितानर्चित, (१३) असंस्तुतासंस्तुत, (१४) पूर्वस्थित पूर्वस्थित, (१५) साक्षिन् साक्षिन्, (१६) तुरु तुरु, (१७) पतंग पतंग, (१८) पिङ्ग पिङ्ग, (१९) ज्ञान ज्ञान, (२०) शब्द शब्द, (२१) सूक्ष्म सूक्ष्म, (२२) शिव, (२३) सर्व, (२४) सर्वद, (२५) ॐ नमो नमः, (२६) ॐ नमः, (२७) शिवाय, (२८) नमो नमः—ये अट्ठाईस पद हैं। स्कन्द! व्यापक आकाश मन है। ‘ॐ नमो वौषट्’—ये अभीष्ट मन्त्रवर्ण हैं। अकार और लकार (अं लं) बीज हैं। इडा और पिङ्गला नामवाली दो नाड़ियाँ हैं। प्राण और अपान—दो वायु हैं और घ्राण तथा उपस्थ—ये दो इन्द्रियाँ हैं। गन्धको ‘विषय’ कहा गया है तथा इसमें गन्ध आदि पाँच गुण हैं। यह पृथ्वीतत्त्वसे सम्बन्धित है। इसका रंग पीला है। इसकी मण्डलाकृति (भूपुर) चौकोर है और चारों ओरसे वज्रसे अङ्कित है। इस पार्थिव मण्डलका विस्तार सौ कोटि योजन माना गया है। चौदह योनियोंको भी इसीके अन्तर्गत जानना चाहिये ॥ २६-३१ ॥
प्रथम छः योनियाँ मृग आदिकी हैं और आठ दूसरी देवयोनियाँ हैं। उनका विवरण इस प्रकार है—मृग पहली योनि है, दूसरी पक्षी, तीसरी पशु, चौथी सर्प आदि, पाँचवीं स्थावर और छठी योनि मनुष्यकी है। आठ देवयोनियोंमें प्रथम पिशाचोंकी योनि है, दूसरी राक्षसोंकी, तीसरी यक्षोंकी, चौथी गन्धर्वोंकी, पाँचवीं इन्द्रकी, छठी सोमकी, सातवीं प्रजापतिकी और आठवीं योनि ब्रह्माकी बतायी गयी है। पार्थिव-तत्त्वपर इन आठोंका अधिकार माना गया है। लय होता है प्रकृतिमें, भोग होता है बुद्धिमें और ब्रह्मा कारण हैं। तदनन्तर जाग्रत् अवस्था-पर्यन्त समस्त भुवन आदिसे गर्भित हुई निवृत्तिकलाका ध्यान करके उसका अपने मन्त्रमें विनियोग करे। वह मन्त्र इस प्रकार है—