अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ८५ * १८५
निमित्त क्रमशः पाँच-पाँच आहुतियाँ दे। मायेय (मायाजनित), मलजनित तथा कर्मजनित आदि* पाश-बन्धनोंकी निवृत्तिके लिये हृदय-मन्त्रसे निष्कृति (प्रायश्चित्त अथवा शुद्धि) कर लेनेपर पीछे अग्निमें सौ आहुतियाँ दे। मलशक्तिका तिरोधान (लय) और पाशोंका वियोग सम्पादित करनेके लिये 'स्वाहान्त' अस्त्र-मन्त्रसे पाँच-पाँच आहुतियोंका हवन करे। अन्तःकरणमें स्थित मल आदि पाशका सात बार अस्त्र-मन्त्रके जपसे अभिमन्त्रित कटार-कला-शस्त्रसे छेदन करे। कला-शस्त्रसे छेदनका मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हां हां हां निवृत्तिकलापाशाय हः हूं फट्'॥ ५१—५७॥
बन्धकताकी निवृत्तिके लिये अस्त्र-मन्त्रसे दोनों हाथोंद्वारा मसलकर गोलाकार करके पाशको घीसे भरे हुए स्रुवमें डाल दे। फिर कलामय अस्त्रसे अथवा केवल अस्त्र-मन्त्रसे उसको जलाकर भस्म कर डाले। तदनन्तर पाशाङ्कुरकी निवृत्तिके लिये पाँच आहुतियाँ दे। आहुतिका मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हः अस्त्राय हूं फट् स्वाहा।' उक्त आहुतिके पश्चात् अस्त्र-मन्त्रसे आठ आहुतियाँ देकर प्रायश्चित्त-कर्म सम्पन्न करे। उसके बाद विधाताका आवाहन करके उनका पूजन और तर्पण करे। फिर 'ॐ हां शब्दस्पर्शौ शुल्कं ब्रह्मन् गृहाण स्वाहा।' इस मन्त्रसे तीन आहुतियाँ देकर शिष्यको अधिकार अर्पित करे। उस समय ब्रह्माजीको भगवान् शिवकी यह आज्ञा सुनावे—'ब्रह्मन्! इस बालकके सम्पूर्ण पाश दग्ध हो गये हैं। अब आपको पुनः इसे बन्धनमें डालनेके लिये यहाँ नहीं रहना चाहिये।'॥ ५८—६३॥
—यों कहकर ब्रह्माजीको बिदा कर दे और संहारमुद्राद्वारा एवं कुम्भक प्राणायामपूर्वक राहुमुक्त एक देशवाले चन्द्रमण्डलके सदृश आत्माको तत्सम्बन्धी-मन्त्रका उच्चारण करते हुए दक्षिण नाड़ीद्वारा धीरे-धीरे लेकर रेचक प्राणायाम एवं 'उद्भव' नामक मुद्राके सहयोगसे पूर्वोक्त सूत्रमें योजित करे। फिर उसकी पूजा करके गुरु अर्घ्यपात्रमें स्थित अमृतोपम जलबिन्दु ले, शिष्यकी पुष्टि एवं तृप्तिके लिये उसके सिरपर रखे। तत्पश्चात् माता-पिताका विसर्जन करके 'वौषडन्त' अस्त्र-मन्त्रके द्वारा विधिकी पूर्तिके लिये पूर्णाहुति-होम करे। ऐसा करनेसे निवृत्तिकलाकी शुद्धि होती है। पूर्णाहुतिका पूरा मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हूं हां अमुक आत्मनो निवृत्तिकलाशुद्धिरस्तु स्वाहा फट् वौषट्'॥ ६४—६७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत निवृत्तिकला-शोधन' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८४॥
पचासीवाँ अध्याय
निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत प्रतिष्ठाकलाके शोधनकी विधिका वर्णन
भगवान् शंकर कहते हैं—स्कन्द! तदनन्तर शुद्ध और अशुद्ध कलाओंका शान्त और नादान्तसंज्ञक ह्रस्व-दीर्घ-प्रयोगद्वारा संधान करे। संधानका मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हां हां ह्रीं हां।' इसके बाद प्रतिष्ठाकलामें निविष्ट जल, तेज, वायु, आकाश, पाँच तन्मात्रा, दस इन्द्रिय, बुद्धि, तीनों गुण, चौबीसवाँ अहंकार और पुरुष—इन पचीस तत्त्वों तथा 'क' से लेकर 'य' तकके पचीस अक्षरोंका चिन्तन करे। प्रतिष्ठाकलामें छप्पन भुवन हैं और उनमें उन्हींके समान
* 'आदि' पदसे यहाँ 'तिरोधान', 'शक्तिज', और 'बिन्दुज' नामक पाश समझने चाहिये।