भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 878 में से

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पृष्ठ 214

* अध्याय ८६ * १८७

नियोजित करे। आत्मामें नियोजनका मन्त्र यों है—'ॐ हां हां हामात्मने नमः।' ॥ १९–२६॥

इसके बाद पूर्ववत् उस जीवचैतन्यके पितासे संयुक्त होनेकी भावना करके वामा उद्भव-मुद्राद्वारा उसे देवीके गर्भमें स्थापित करे। साथ ही इस मन्त्रका उच्चारण करे—'ॐ हां हां हामात्मने नमः।' देहोत्पत्तिके लिये हृदय-मन्त्रसे पाँच बार और जीवात्माकी स्थितिके लिये शिरोमन्त्रसे पाँच बार आहुति दे। अधिकार-प्राप्तिके लिये शिखा-मन्त्रसे, भोगसिद्धिके लिये कवच-मन्त्रसे, लयके लिये अस्त्र-मन्त्रसे, स्रोतःसिद्धिके लिये शिव-मन्त्रसे तथा तत्त्वशुद्धिके लिये हृदय-मन्त्रसे इसी तरह पाँच-पाँच आहुतियाँ देनी चाहिये। इसके बाद पूर्ववत् गर्भाधान आदि संस्कार करे। पाशकी शिथिलता और निष्कृति (प्रायश्चित्त)-के लिये शिरोमन्त्रसे सौ आहुतियाँ दे। मलशक्तिके तिरोधान (निवारण)-के लिये स्वाहान्त अस्त्र-मन्त्रसे पाँच बार हवन करे॥ २७–३०॥

इस प्रकार पाश-वियोग होनेपर भी सात बार अस्त्र-मन्त्रके जपपूर्वक कलाबीजसे युक्त अस्त्र-मन्त्ररूपी कटारसे उस कलापाशको काट डाले। वह मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ ह्रीं प्रतिष्ठाकलापाशाय हूं फट्।' तदनन्तर पाश-शस्त्रसे उस पाशको मसलकर वर्तुलाकार बनाकर पूर्ववत् घृतपूर्ण स्रुवामें रख दे और कला-शस्त्रसे ही उसकी आहुति दे दे। इसके बाद पाशाङ्कुरकी निवृत्तिके लिये अस्त्र-मन्त्रसे पाँच आहुतियाँ दे और प्रायश्चित्त-निवारणके लिये फिर आठ आहुतियोंका हवन करे। आहुतिके लिये अस्त्र-मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हः अस्त्राय हूं फट्।'॥ ३१–३५॥

इसके बाद हृदय-मन्त्रसे भगवान् हृषीकेशका आवाहन करके पूर्वोक्त विधिसे उनका पूजन और तर्पण करनेके पश्चात् अधिकार-समर्पण करे। इसके लिये मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हां विष्णो रसं शुल्कं गृहाण स्वाहा।' इसके बाद उन्हें भगवान् शिवकी आज्ञा इस प्रकार सुनावे—'हरे! इस पशुका पाश सम्पूर्णतः दग्ध हो चुका है। अब आपको इसके लिये बन्धनकारक होकर नहीं रहना चाहिये।' शिवाज्ञा सुनानेके बाद रौद्री नाड़ीद्वारा गोविन्दका विसर्जन करके राहुमुक्त आधे भागवाले चन्द्रमण्डलके समान आत्माको नियोजित करे—संहारमुद्राद्वारा उसे आत्मस्थ करके उद्भवमुद्राद्वारा सूत्रमें उसकी संयोजना करे। तत्पश्चात् पूर्ववत् जलबिन्दु-सदृश उस आत्माको शिष्यके सिरपर स्थापित करे। इससे उसका आप्यायन होता है। फिर अग्निके पिता-माताका पुष्प आदिसे पूजन एवं विसर्जन करके विधिकी पूर्तिके लिये विधानपूर्वक पूर्णाहुति प्रदान करे। ऐसा करनेसे प्रतिष्ठाकलाका भी शोधन सम्पन्न हो जाता है॥ ३६–४१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत प्रतिष्ठाकलाके शोधनकी विधिका वर्णन' नामक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८५॥


छियासीवाँ अध्याय

निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत विद्याकलाका शोधन

भगवान् शिव कहते हैं—स्कन्द! पूर्ववर्तिनी कला-प्रतिष्ठाके साथ विद्याकलाका संधान करे तथा पूर्ववत् उसमें तत्त्व-वर्ण आदिका चिन्तन भी करे। उसके लिये मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ हां हीं हूं हां।'—यह संधान-मन्त्र है। राग, शुद्ध विद्या, नियति, कला, काल, माया तथा अविद्या—ये सात तत्त्व तथा र, ल, व, श, ष, स —ये छः वर्ण विद्याकलाके अन्तर्गत बताये गये हैं।

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