अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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करके पूजन-तर्पण करनेके पश्चात् उन्हें विधिपूर्वक शुल्क समर्पण करे। मन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ हां ईश्वर बुद्धयहंकारौ शुल्कं गृहाण स्वाहा।’ इसके बाद ईश्वरको शिवकी यह आज्ञा सुनावे—‘ईश्वर! इस पशुके सारे पाश दग्ध हो गये हैं। अब तुम्हें इसके लिये बन्धनकारक होकर नहीं रहना चाहिये’॥ १८–२३॥
—यों कहकर ईश्वर देवका विसर्जन करे और रौद्रीशक्तिसे आत्माको नियोजित करे। जैसे ईशने चन्द्रमाको अपने मस्तकपर आश्रय दे रखा है, उसी प्रकार शिष्यके जीवात्माको गुरु अपने आत्मामें नियोजित करे। फिर शुद्धा उद्भव-मुद्राके द्वारा इसकी सूत्रमें संयोजना करे और मूल-मन्त्रसे शिष्यके मस्तकपर अमरबिन्दुस्वरूप उस चैतन्यसूत्रको रखे; तदनन्तर पुष्प आदिसे पूजित अग्निके पिता-माताका विसर्जन करके विधिज्ञ पुरुष समस्त विधिकी पूर्ति करनेवाली पूर्णाहुति प्रदान करे। इसमें भी पूर्ववत् ताड़न आदि करना चाहिये। विशेषतः कला-सम्बन्धी अपने बीजका प्रयोग होना चाहिये। इस प्रकार शान्तिकलाकी शुद्धि बतायी गयी॥ २४–२७॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'निर्वाण-दीक्षाके अन्तर्गत शान्तिकलाका शोधन' नामक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ८७॥
अठासीवाँ अध्याय
निर्वाण-दीक्षाकी अवशिष्ट विधिका वर्णन
भगवान् शंकर कहते हैं—स्कन्द! विशुद्ध शान्तिकलाके साथ शान्त्यतीतकलाका संधान करे। उसमें भी पूर्ववत् तत्त्व और वर्ण आदिका चिन्तन करना चाहिये, जैसा कि नीचे बताया जाता है। संधानकालमें इस मन्त्रका उच्चारण करे—‘ॐ हां हौं हूं हां।’ शान्त्यतीतकलामें शिव और शक्ति—ये दो तत्त्व हैं। आठ भुवन हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—इन्धक, दीपक, रोचक, मोचक, ऊर्ध्वगामी, व्योमरूप, अनाथ और आठवाँ अनाश्रित। ॐकार पद है, ईशान मन्त्र है, अकारसे लेकर विसर्गतक सोलह अक्षर हैं, नाद और हकार—ये दो बीज हैं, कुहू और शङ्खिनी—दो नाड़ियाँ हैं, देवदत्त और धनञ्जय—दो प्राणवायु हैं, वाक् और श्रोत्र—दो इन्द्रियाँ हैं, शब्द विषय है, गुण भी वही है और अवस्था पाँचवीं तुरीयातीता है॥ १–६॥
सदाशिव देव ही एकमात्र हेतु हैं। इस तत्त्वादिसंचयकी शान्त्यतीतकलामें स्थिति है, ऐसा चिन्तन करके ताड़न आदि कर्म करे। ‘फडन्त’ मन्त्रसे कला-पाशका ताड़न और बोधन करके नमस्कारान्त-मन्त्रसे शिष्यके अन्तःकरणमें प्रवेश करे। इसके बाद फडन्त-मन्त्रसे जीवचैतन्यको पाशसे वियुक्त करे। ‘वषट्’ और ‘नमः’ पदोंसे सम्पुटित, स्वाहान्त-मन्त्रका उच्चारण करके, अङ्कुशमुद्रा तथा पूरक प्राणायामद्वारा पाशका मस्तकसूत्रसे आकर्षण करके, कुम्भक प्राणायामद्वारा उसे लेकर, रेचक प्राणायाम एवं उद्भव-मुद्राद्वारा हृदय-मन्त्रसे सम्पुटित नमस्कारान्त-मन्त्रसे उसका अग्निकुण्डमें स्थापन करे। इसका पूजन आदि सब कार्य निवृत्तिकलाके समान ही सम्पन्न करे। सदाशिवका आवाहन, पूजन और तर्पण करके उनसे भक्तिपूर्वक इस प्रकार निवेदन करे—"भगवन्! इस ‘साद’ संज्ञक मुमुक्षुको तुम्हारे अधिकारमें दीक्षित करता हूँ। तुम्हें सदा इसके