अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 226, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ९२ * १९९
पर्यन्त शिवतत्त्व, विद्यातत्त्व तथा आत्मतत्त्वकी स्थिति है। पुष्पमाला आदिसे चिह्नित स्थानोंपर क्रमशः तीनों तत्त्वोंका अपने मन्त्रसे और तत्त्वेशोंका हृदय-मन्त्रसे पूजन करे। पूजनके मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ हूं शिवतत्त्वाय नमः। ॐ हां शिवतत्त्वाधिपाय रुद्राय नमः। ॐ हां विद्यातत्त्वाय नमः। ॐ हां विद्यातत्त्वाधिपाय विष्णवे नमः। ॐ हां आत्मतत्त्वाय नमः। ॐ हां आत्मतत्त्वाधिपतये ब्रह्मणे नमः।'॥ ४१-४६॥
प्रत्येक तत्त्व और प्रत्येक शिलामें पृथ्वी, अग्नि, यजमान, सूर्य, जल, वायु, चन्द्रमा और आकाश—इन आठ मूर्तियोंका न्यास करे। फिर क्रमशः शर्व, पशुपति, उग्र, रुद्र, भव, ईश्वर (या ईशान), महादेव तथा भीम—इन मूर्तीश्वरोंका न्यास करे। मूर्तियों तथा मूर्तीश्वरोंके मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ धरामूर्तये नमः। ॐ धराधिपतये शर्वाय नमः।' इसके बाद अनन्त आदि लोकपालोंका क्रमशः अपने मन्त्रोंसे न्यास करे। इन्द्र आदि लोकपालोंके बीज आगे बताये जानेवाले क्रमसे यों जानने चाहिये—लूं, रूं, यूं, वूं, श्रृं, पूं, सूं, हूं, क्षूं। यह नौ शिलाओंके पक्षमें बताया गया है। जब पाँच पदकी शिलाएँ हों, तब प्रत्येक तत्त्वमयी शिलामें स्पर्शपूर्वक पृथ्वी आदि पाँच मूर्तियोंका न्यास करे। उक्त मूर्तियोंके पाँच मूर्तीश इस प्रकार हैं—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव। इन पाँचोंका उक्त पाँचों मूर्तियोंमें पूर्ववत् पूजन करना चाहिये॥ ४७-५३॥
'ॐ पृथिवीमूर्तये नमः। ॐ पृथिवीमूर्त्यधिपतये ब्रह्मणे नमः।' इत्यादि मन्त्र पूजनके लिये जानने चाहिये। क्रमशः पाँच कलशोंका अपने नाम-मन्त्रोंसे पूजन करके उन्हें स्थापित करे। मध्यशिलाके क्रमसे विधिपूर्वक न्यास करे। विभूति, कुशा और तिलोंसे अस्त्र-मन्त्रद्वारा प्राकारकी कल्पना करे। कुण्डोंमें आधार-शक्तिका न्यास और पूजन करके तत्त्वों, तत्त्वाधिपों, मूर्तियों तथा मूर्तीश्वरोंका घृत आदिसे तर्पण करे। तत्पश्चात् ब्रह्मात्म-शुद्धिके लिये मूलके अङ्गभूत ब्रह्म-मन्त्रोंद्वारा क्रमशः सौ-सौ आहुतियाँ देकर पूर्णाहुति-पर्यन्त होम करनेके पश्चात् शान्ति-जलसे शिलाओंका प्रोक्षणपूर्वक पूजन करे। कुशाओंद्वारा स्पर्श करके प्रत्येक तत्त्वमें क्रमशः सांनिध्य और संधान करके फिर शुद्ध-न्यास करे। इस प्रकार जा-जाकर तीन भागोंमें कर्म करे। मन्त्र यों हैं—'ॐ आम् ईम् आत्मतत्त्वविद्यातत्त्वाभ्यां नमः।' इति॥ ५४-६०॥
कुशके मूल आदिसे क्रमशः तत्त्वेशादि तीनका स्पर्श करे। इसके बाद ह्रस्व-दीर्घके प्रयोगपूर्वक तत्त्वानुसंधान करे। इसके लिये मन्त्र यों है—'ॐ इं ऊं विद्यातत्त्वशिवतत्त्वाभ्यां नमः।' तदनन्तर घी और मधुसे भरे हुए पञ्चरत्नयुक्त और पञ्चगव्यसे अग्रभागमें अभिषिक्त पाँच कलशोंका, जिनके देवता पञ्च-लोकपाल हैं, अपने मन्त्रोंसे पूजन करके उनके निकट होम करे। फिर समस्त शिलाओंके अधिदेवताओंका ध्यान करे। 'वे शिलाधिदेवता विद्यास्वरूप हैं, स्नान कर चुके हैं। उनकी अङ्गकान्ति सुवर्णके समान उद्दीप्त होती है। वे उज्ज्वल वस्त्र धारण करते हैं और समस्त आभूषणोंसे सम्पन्न हैं।' न्यूनादि दोष दूर करनेके लिये तथा वास्तु-भूमिकी शुद्धिके लिये अस्त्र-मन्त्रद्वारा पूर्णाहुति-पर्यन्त सौ-सौ आहुतियाँ दे॥ ६१-६५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'प्रतिष्ठाके अङ्गभूत शिलान्यासकी विधिका वर्णन' नामक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९२॥