अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ९६ * २०७
और उसका ढक्कन मँगा ले। ताँबेकी बनी हुई करछुल तथा पादाभ्यङ्गके लिये घृत और मधुका पात्र भी संगृहीत कर ले॥ ४३–४७॥
कुशके तीस दलोंसे बने हुए दो-दो हाथ लंबे-चौड़े चार-चार आसन एकत्र कर ले। इसी तरह पलाशोंके बने हुए चार-चार परिधि भी जुटा ले। तिलपात्र, हविष्यपात्र, अर्घ्यपात्र और पवित्रक एकत्र करे। इनका मान बीस-बीस पल है। घण्टा और धूपदानी भी मँगा ले। स्रुक्, स्रुवा, पिटक (पिटारी एवं टोकरी), पीठ (पीढ़ा या चौकी), व्यजन, सूखी लकड़ी, फूल, पत्र, गुग्गुल, घीके दीपक, धूप, अक्षत, तिगुना सूत, गायका घी, जौ, तिल, कुशा, शान्तिकर्मके लिये त्रिविध मधुर पदार्थ (मधु, शक्कर और घी), दस पर्वकी समिधाएँ, बाँह-बराबर या एक हाथका स्रुवा, सूर्य आदि ग्रहोंकी शान्तिके लिये समिधाएँ—आक, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशा भी संग्रहणीय हैं। आक आदिमें प्रत्येककी समिधाएँ एक सौ आठ-आठ होनी चाहिये। ये न मिल सकें तो इनकी जगह जौ और तिलोंकी आहुति देनी चाहिये। इनके सिवा घरेलू आवश्यकताकी वस्तुओंका भी संग्रह करे॥ ४८–५३॥
बटलोई, करछुल, ढक्कन आदि जुटा ले। देवता आदिके लिये प्रत्येकको दो-दो वस्त्र देने चाहिये। आचार्यकी पूजाके लिये मुद्रा, मुकुट, वस्त्र, हार, कुण्डल और कङ्कन आदि तैयार करा ले। धन खर्च करनेमें कंजूसी न करे॥ ५४$\frac{१}{२}$॥
मूर्ति धारण करनेवाले तथा अस्त्र-मन्त्रका जप करनेवाले ब्राह्मणोंको आचार्यकी अपेक्षा एक-एक चौथाई कम दक्षिणा दे। सामान्य ब्राह्मणों, ज्योतिषियों तथा शिल्पियोंको जपकर्ताओंके बराबर ही पूजा देनी चाहिये। हीरा, सूर्यकान्तमणि, नीलमणि, अतिनीलमणि, मुक्ताफल, पुष्पराग, पद्मराग तथा आठवाँ रत्न वैदूर्यमणि—इनका भी संग्रह करे। उशीर (खस), विष्णुक्रान्ता (अपराजिता), रक्तचन्दन, अगुरु, श्रीखण्ड, शारिवा (अनन्ता या श्यामालता), कुष्ठ (कुट) और शङ्खिनी (श्वेत पुन्नाग)—इन ओषधियोंका समुदाय संग्रहणीय है॥ ५५–५७$\frac{१}{२}$॥
सोना, ताँबा, लोहा, राँगा, चाँदी, काँसी और सीसा—इन सबकी ‘लोह’ संज्ञा है। इनका भी संग्रह करे। हरिताल, मैनसिल, गेरू, हेममाक्षीक, पारा, वह्निगैरिक, गन्धक और अभ्रक—ये आठ धातुएँ संग्रहणीय हैं। इसी प्रकार आठ प्रकारके व्रीहियों (अनाजों)-का भी संग्रह करना चाहिये। उनके नाम इस प्रकार हैं—धान, गेहूँ, तिल, उड़द, मूँग, जौ, तिन्नी और साँवाँ॥ ५८–६१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘प्रतिष्ठा, काल और सामग्री आदिकी विधिका वर्णन’ नामक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥
छियानबेवाँ अध्याय
प्रतिष्ठामें अधिवासकी विधि
**भगवान् शिव कहते हैं—**स्कन्द! पुरोहितको चाहिये कि वह स्नान करके प्रातःकाल और मध्याह्नकाल, दोनों समयोंका नित्यकर्म सम्पन्न करके मूर्तिरक्षक सहायक ब्राह्मणोंके साथ यज्ञमण्डपको पधारे। (मूर्तिभिर्जापिभिर्विप्रैः — इस पाठान्तरके अनुसार मूर्तियों और जपकर्ता ब्राह्मणोंके साथ यज्ञमण्डपमें जाय, ऐसा अर्थ समझना चाहिये।) फिर वहाँ शान्ति आदि