भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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२२० * अग्निपुराण *


देवताओंका पूजन करे। इनके मन्त्र पहले बताये गये हैं। ‘ॐ सुं सुभागायै नमः’—इससे सुभागाका, ‘ॐ ह्रीं ललितायै नमः।’ से ललिताका पूजन करे। ‘ॐ ह्रीं कामिन्यै नमः।’ ‘ॐ हूं काममालिन्यै नमः।’—इन मन्त्रोंसे गौरीकी प्रतिष्ठा, पूजा और जप करनेसे उपासक सब कुछ पा लेता है*॥ १६-१७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘गौरी-प्रतिष्ठा-विधिका वर्णन’ नामक अठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९८॥


निन्यानबेवाँ अध्याय

सूर्यदेवकी स्थापनाकी विधि

**भगवान् शिव बोले—**स्कन्द! अब मैं सूर्यदेवकी प्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा। पूर्ववत् मण्डप-निर्माण और स्नान आदि कार्यका सम्पादन करके, पूर्वोक्त विधिसे विद्या तथा साङ्ग सूर्यदेवका आसन-शय्यामें न्यास करके त्रितत्त्वका, ईश्वरका तथा आकाशादि पाँच भूतोंका न्यास करे॥ १-२॥

पूर्ववत् शुद्धि आदि करके पिण्डीका शोधन करे। फिर सदेशपद-पर्यन्त तत्त्व-पञ्चकका न्यास करे। तदनन्तर सर्वतोमुखी शक्तिके साथ विधिवत् स्थापना करके, गुरु सूर्य-सम्बन्धी मन्त्र बोलते हुए शक्त्यन्त सूर्यका विधिवत् स्थापन करे॥ ३-४॥

श्रीसूर्यदेवका स्वाम्यन्त अथवा पादान्त नाम रखे। (यथा विक्रमादित्य-स्वामी अथवा रामादित्यपाद इत्यादि) सूर्यके मन्त्र पहले बताये गये हैं, उन्हींका स्थापनकालमें भी साक्षात्कार (प्रयोग) करना चाहिये॥ ५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘सूर्य-प्रतिष्ठा-विधिका वर्णन’ नामक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९९॥


सौवाँ अध्याय

द्वारप्रतिष्ठा-विधि

**भगवान् शंकर कहते हैं—**स्कन्द! अब मैं द्वारगत प्रतिष्ठाकी विधिका वर्णन करूँगा। द्वारके अङ्गभूत उपकरणोंका कसैले जल आदिसे संस्कार करके उन्हें शय्यापर रखे। द्वारके मूल, मध्य और अग्रभागोंमें आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्वका न्यास करके संनिरोधिनी-मुद्राद्वारा उनका निरोध करे। फिर तदनुरूप होम और जप करके, द्वारके अधोभागमें अनन्त देवताके मन्त्रसे वास्तु-देवताकी


* सोमशम्भुकी ‘कर्मकाण्ड-क्रमावली’में इन मन्त्रोंके स्वरूप और बीज कुछ भिन्न रूपमें मिलते हैं। अतः उन्हें अविकल रूपमें यहाँ उद्धृत किया जाता है—ॐ आं आधारशक्तये नमः। ॐ ईं कन्दराय नमः। ॐ ॐ नालाय नमः। ॐ ऋं धर्माय नमः। ॐ ॠं ज्ञानाय नमः। ॐ लूं वैराग्याय नमः। ॐ लूं ऐश्वर्याय नमः। ॐ ऋं अधर्माय नमः। ॐ ॠं अज्ञानाय नमः। ॐ लूं अवैराग्याय नमः। ॐ लूं अनैश्वर्याय नमः। ॐ अः ऊर्ध्वच्छदनाय नमः। ॐ हां पद्माय नमः। ॐ हं केसरेभ्यो नमः। ॐ हं कर्णिकायै नमः। ॐ हं पुष्करेभ्यो नमः। ॐ हं प्राज्यै नमः। ॐ ह्रीं ज्ञानवत्यै नमः। ॐ हूं क्रियायै नमः। ॐ ह्लं वामायै नमः। ॐ ह्लं वागीश्वर्यै नमः। ॐ ह्रीं ज्वलिन्यै नमः। ॐ ह्रीं ज्येष्ठायै नमः। ॐ ह्रौं रौद्र्यै नमः इति सर्वशक्तयः। ॐ गां गौर्यासन नमः। ॐ गों गौरीमूर्तये नमः। ॐ ह्रीं सः महागौरि रुद्रदयिते स्वाहा।—इति मूलमन्त्रः। गां हृदयाय नमः। गीं शिरसे स्वाहा। गूं शिखायै वषट्। गैं कवचाय हुम्। गौं नेत्रेभ्यो वौषट्। गः अस्त्राय फट्। ॐ सीं ज्ञानशक्तये नमः। ॐ सूं क्रियाशक्तये नमः। लोकपालमन्त्रास्तु पूर्वोक्ताः। ऐं सैं सुभागायै नमः। ॐ सैं ललितायै नमः। ॐ स्हं कामिन्यै नमः। ॐ स्हौं काममालिन्यै नमः। इत्येता गौरीसमानसख्यः।