भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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२२४ * अग्निपुराण *

एक सौ तीनवाँ अध्याय

शिवलिङ्ग आदिके जीर्णोद्धारकी विधि

भगवान् शंकर कहते हैं—स्कन्द! जीर्ण आदि लिङ्गोंके विधिवत् उद्धारका प्रकार बता रहा हूँ। जिसका चिह्न मिट गया हो, जो टूट-फूट गया हो, मैल आदिसे स्थूल हो गया हो, वज्रसे आहत हुआ हो, सम्पुटित (बंद) हो, फट गया हो, जिसका अङ्ग-भङ्ग हो गया हो तथा जो इसी तरहके अन्य विकारोंसे ग्रस्त हो—ऐसे दूषित लिङ्गोंकी पिण्डी तथा वृषभका तत्काल त्याग कर देना चाहिये॥ १-२॥

जो शिवलिङ्ग किसीके द्वारा चालित हो या स्वयं चलित हो, अत्यन्त नीचा हो गया हो, विषम स्थानमें स्थित हो; जहाँ दिङ्मोह होता हो, जो किसीके द्वारा गिरा दिया गया हो अथवा जो मध्यस्थ होकर भी गिर गया हो—ऐसे लिङ्गकी पुनः ठीकसे स्थापना कर देनी चाहिये। परंतु यदि वह व्रणरहित हो, तभी ऐसा किया जा सकता है। यदि वह नदीके जलप्रवाहद्वारा वहाँसे अन्यत्र हटा दिया जाता हो तो उस स्थानसे अन्यत्र भी शास्त्रीय विधिके अनुसार उसकी स्थापना की जा सकती है। जो शिवलिङ्ग अच्छी तरह स्थित हो, सुदृढ़ हो, उसे विचलित करना या चलाना नहीं चाहिये॥ ३-५॥

जो अस्थिर या अदृढ़ हो, उस शिवलिङ्गको यदि चालित करे तो उसकी शान्तिके लिये एक सहस्त्र आहुतियाँ दे तथा सौ आहुतियाँ देकर पुनः उसकी स्थापना करे। जीर्णता आदि दोषोंसे युक्त शिवलिङ्ग भी यदि नित्यपूजा-अर्चा आदिसे युक्त हो तो उसे सुस्थित ही रहने दे; चालित न करे। जीर्णोद्धारके लिये दक्षिणदिशामें एक मण्डप बनावे। ईशानकोणमें पश्चिम द्वारका एक फाटक लगा दे। द्वारपूजा आदि करके, वेदीपर शिवजीकी पूजा करे। इसके बाद मन्त्रोंका पूजन और तर्पण करके वास्तुदेवताकी पूर्ववत् पूजा करे। तदनन्तर बाहर जा, दिशाओंमें बलि दे, स्वयं आचमन करनेके पश्चात् गुरु ब्राह्मणोंको भोजन करावे। तत्पश्चात् भगवान् शंकरको इस प्रकार विज्ञप्ति दे—॥ ६-८॥

'शम्भो! यह लिङ्ग दोषयुक्त हो गया है। इसके उद्धार करनेसे शान्ति होगी—ऐसा आपका वचन है। अतः विधिपूर्वक इसका अनुष्ठान होने जा रहा है। शिव! इसके लिये आप मेरे भीतर स्थित होइये और अधिष्ठाता बनकर इस कार्यका सम्पादन कीजिये।' देवेश्वर शिवको इस प्रकार विज्ञप्ति देकर मधु और घृतमिश्रित खीर एवं दूर्वाद्वारा मूल-मन्त्रसे एक सौ आठ आहुतियाँ देकर शान्ति-होमका कार्य सम्पन्न करे। तदनन्तर लिङ्गको स्नान कराकर वेदीपर इसकी पूजा करे। पूजनकालमें 'ॐ व्यापकेश्वराय शिवाय नमः।' इस मन्त्रका उच्चारण करे। अङ्गपूजा और अङ्गन्यासके मन्त्र इस प्रकार हैं—'ॐ व्यापकेश्वराय हृदयाय नमः। ॐ व्यापकेश्वराय शिरसे स्वाहा। ॐ व्यापकेश्वराय शिखायै वषट्। ॐ व्यापकेश्वराय कवचाय हुम्। ॐ व्यापकेश्वराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ व्यापकेश्वराय अस्त्राय फट्।'॥ ९-१३॥

तत्पश्चात् उस शिवलिङ्गके आश्रित रहनेवाले भूतको अस्त्र-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक सुनावे—'यदि कोई भूत-प्राणी यहाँ इस लिङ्गका आश्रय लेकर रहता है, वह भगवान् शिवकी आज्ञासे इस लिङ्गको त्यागकर, जहाँ इच्छा हो, वहाँ चला जाय। अब यहाँ विद्या तथा विद्येश्वरोंके साथ साक्षात् भगवान् शम्भु निवास करेंगे।' इसके बाद पाशुपतमन्त्रसे प्रत्येक भागके लिये सहस्त्र आहुतियाँ देकर शान्तिजलसे प्रोक्षण करे। फिर कुशोंद्वारा स्पर्श करके उक्त मन्त्रको जपे॥ १४-१६॥