भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 276
  • अध्याय ११७ * २४९

उतावली न करे। नम्र, सत्यवादी और सावधान रहे। उस दिन अधिक मार्ग न चले, स्वाध्याय भी न करे, मौन रहे। सम्पूर्ण पंक्तिमूर्धन्य (पंक्तिमें सर्वश्रेष्ठ अथवा पंक्तिपावन) ब्राह्मणोंसे प्रत्येक कर्मके विषयमें पूछे। आसनपर कुश बिछावे। पितृकर्ममें कुशोंको दोहरा मोड़ देना चाहिये। पहले देव-कर्म, फिर पितृ-कर्म करे।$^१$ देव-धर्ममें स्थित ब्राह्मणोंसे पूछे—'मैं विश्वेदेवोंका आवाहन करूँगा।' ब्राह्मण आज्ञा दें—'आवाहन करो', तब ‘विश्वेदेवास आगत शृणुताम इमं हवम्, एदं बर्हिर्निषीदत' (यजु० ७। ३४)—इस मन्त्रके द्वारा विश्वेदेवोंका आवाहन करके आसनपर जौ छोड़े तथा 'विश्वेदेवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षे य उपद्यविष्ठ। ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम्॥' (यजु० ३३। ५३)—इस मन्त्रका जप करे। तत्पश्चात् पितृकर्ममें नियुक्त ब्राह्मणोंसे पूछे—'मैं पितरोंका आवाहन करूँगा।' ब्राह्मण कहें—'आवाहन करो।' तब 'उशन्तस्त्वा०'$^२$ इस मन्त्रका पाठ करते हुए आवाहन करे। फिर ‘अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः॥' (यजु० २। २९)—इस मन्त्रसे तिल बिखेरकर ‘आयन्तु नः०'$^३$ इत्यादि मन्त्रका जप करे। इसके बाद पवित्रकसहित अर्घ्यपात्रमें ‘शं नो देवी०'$^४$ इस मन्त्रसे जल डाले॥ ६—१०॥

तदनन्तर 'यवोऽसि'$^५$ इस मन्त्रसे जौ देकर पितरोंके निमित्त सर्वत्र तिलका उपयोग करे। (पितरोंके अर्घ्यपात्रमें भी 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे जल डालकर) ‘तिलोऽसि सोमदेवत्यो गोसवे देवनिर्मितः। प्रत्नवद्भिः प्रत्तः स्वधया पितॄँल्लोकान् पृणीहि नः स्वधा।' यह मन्त्र पढ़कर तिल डाले। फिर 'श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्याव-होरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्नि-षाणामुं म इषाण सर्वलोकं म इषाण॥' (यजु० ३१। २२) इस मन्त्रसे अर्घ्यपात्रमें फूल छोड़े। अर्घ्यपात्र सोना, चाँदी, गूलर अथवा पत्तेका होना चाहिये। उसीमें देवताओंके लिये सव्यभावसे और पितरोंके लिये अपसव्यभावसे उक्त वस्तुएँ रखनी चाहिये। एक-एकको एक-एक अर्घ्यपात्र पृथक्-पृथक् देना उचित है। पितरोंके हाथोंमें पहले पवित्री रखकर ही उन्हें अर्घ्य देना चाहिये॥ ११—१३॥

तत्पश्चात् (देवताओंके अर्घ्यपात्रको बायें हाथमें लेकर उसमें रखी हुई पवित्रीको दाहिने हाथसे निकालकर देव-भोजन-पात्रपर पूर्वाग्र करके रख दे। उसके ऊपर दूसरा जल देकर अर्घ्यपात्रको ढककर) निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़े—‘ॐ या दिव्या आपः पयसा सम्बभूवुर्या अन्तरिक्षा उत पार्थिवीर्याः। हिरण्यवर्णा यज्ञियास्ता न आपः शिवाः शंः स्योनाः सुहवा भवन्तु॥' फिर (जौ, कुश और जल हाथमें लेकर संकल्प पढ़े—) ‘ॐ अद्यामुकगोत्राणां पितृपितामह-प्रपितामहानाम् अमुकामुकशर्मणाम् अमुकश्राद्धसम्बन्धिनो विश्वेदेवाःएष वो हस्तार्घ्यः स्वाहा।'—यों कहकर देवताओंको अर्घ्य देकर पात्रको दक्षिण भागमें सीधे रख दे। इसी प्रकार पिता आदिके लिये भी अर्घ्य दे। उसका संकल्प इस प्रकार है—'ओम्अद्य अमुकगोत्र पितः


१. श्राद्ध आरम्भ करनेसे पूर्व रक्षा-दीप जला लेना चाहिये।
२. ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्तः समिधीमहि। उशन्नुशत आवह पितॄन् हविषे अत्तवे॥ (यजु० १९। ७०)
३. ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः। अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥ (यजु० १९। ५८)
४. ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शंय्योरभिस्स्रवन्तु नः॥ (अथर्व० १। ६। १)
५. ॐ यवोऽसि यवयास्मद्द्वेषो यवयारातीः। (यजु० ५। २६)