अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 292, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १२२ * २६५
उसे द्विगुणित करनेपर फिर एक घटाये तो भी चर आदि करण निकलते हैं। कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके परार्धसे शकुनि, चतुरङ्घ्रि (चतुष्पद), किंस्तुघ्न और अहि (नाग)—ये चार स्थिर करण होते हैं। इस तरह शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिके पूर्वार्द्धमें किंस्तुघ्न करण होता है* ॥ १४—२४ ॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'ज्योतिष-शास्त्रके अन्तर्गत कालगणना' नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२२ ॥
* इस अध्यायमें वर्णित गणितको उदाहरण देकर समझाया जाता है—
कल्पना कीजिये कि वर्तमान वर्षगण-संख्या = २१ है और वर्तमान शकमें वैशाख शुक्ल प्रतिपदाको पञ्चाङ्ग-मान-साधन करना है तो चैत्र शुक्लादि गतमास १ हुआ। वर्षगण २१ को १२ से गुणा करके उसमें चैत्र शुक्लादि गतमासकी संख्या १ मिलानेसे २१×१२+१= २५३ हुआ। इसे द्विगुणित करके दो स्थानोंमें रखा। प्रथम स्थानमें ४ और दूसरे स्थानमें ८६५ मिलाया।
यथा—२५३×२=५०६।
$$\begin{array}{rccr}
५०६ & । & ५०६ \
४ & । & ८६५ \
\hline
५१० & । & १३७१
\end{array}$$
इसे (६० से) तष्टित (विभाजित) किया तो ५३२।५१ हुआ अर्थात् (१३७१) में ६० से भाग देनेपर लब्धि २२ शेष ५१ आता है। लब्धिको (५१०) में मिलाया तो (५३२।५१) हुआ। इसका नाम सगुण या गुणसंज्ञ रखा।
फिर इस गुणसंज्ञको तीन स्थानोंमें रखा—
$$\begin{array}{rccl}
५३२ & । & ५१ & \text{ऊर्ध्व संख्या} \
& ५३२ & । & ५१ & \text{मध्य संख्या} \
&& ५३२ & । & ५१ & \text{अधः संख्या}
\end{array}$$
इसमें मध्य (५३२।५१)-को आठसे गुणा किया तो (४२५६।४०८) हुआ, फिर इसे ४ से गुणा किया तो (१७०२४।१६३२) हुआ। इसे ६० से तष्टित किया अर्थात् (१६३२) में ६० से भाग देकर शेष १२ को अपने स्थानपर रखा, लब्धि २७ को बायें अङ्कमें मिलाया तो (१७०५१ । १२) हुआ। इस तरह मध्यका संस्कार करके उसे मध्यके स्थानमें रखकर न्यास किया—
$$\begin{array}{rccl} ५३२ & । & ५१ \ & १७०५१ & । & १२ \ && ५३२ & । & ५१ \end{array}$$
$$\begin{array}{ccccccl} \text{ऊर्ध्व} && \text{मध्य} &&& \text{अधः} & \text{सबोंको यथास्थानीय योग किया} \ ५३२ & । & १७१०२ & । & ५४४ & । & ५१ & \text{इस (५१) को छोड़ दिया तो—} \ \text{ऊर्ध्व} && \text{मध्य} &&& \text{अधः} \ ५३२ & । & १७१०२ & । && ५४४ & \text{हुआ। यहाँपर तृतीय स्थानीय (अधः अङ्कमें ३८८ और} \ \text{मध्यमें} & \text{'सैकरसाष्टक'} &&&&& \ && ८७ &&& ३८८ & \text{= ८७ घटाया तो—} \ \hline \text{शेष रहा—} &&&&&& \ ५३२ & । & १७०१५ & । && १५६ & \text{इसे ६० से तष्टित किया तो—} \ \hline ८१५ & । & ३७ & । && ३६ & \text{हुआ न्यूनः सप्तकृतः अर्थात् वार-स्थानमें ७ से भाग दिया} \ &&&&&& \text{शेष = ३} \ \hline ३ & । & ३७ & । && ३६ & \text{यह तिथिका ध्रुवा-मान हुआ, जिसे तिथि-नाड़ी कहते हैं।} \end{array}$$
फिर गुणसंज्ञ (५३२।५१) को २ से गुणा किया तो १०६४।१०२ हुआ। ६० से तष्टित किया तो १०६५।४२ हुआ। प्रथम