अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १२८ * | २८१ |
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है*। आगन्तुक योद्धा जिस दिशामें जो नक्षत्र है, उसी नक्षत्रमें उसी दिशासे कोटमें यदि प्रवेश करता है तो उसकी विजय होती है। कोटके बीचमें जो नक्षत्र हैं, उन नक्षत्रोंमें जब शुभ ग्रह आये, तब युद्ध करनेसे मध्यवालेकी विजय तथा चढ़ाई करनेवालेकी पराजय होती है। प्रवेश करनेवाले नक्षत्रमें प्रवेश करना तथा निर्गमवाले नक्षत्रमें निकलना चाहिये। शुक्र, मङ्गल और बुध—ये जब नक्षत्रके अन्तमें रहें, तब यदि युद्ध आरम्भ किया जाय तो आक्रमणकारीकी पराजय होती है। प्रवेशवाले चार नक्षत्रोंमें यदि युद्ध छेड़ा जाय तो वह दुर्ग वशमें हो जाता है—इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है॥ १—१३॥ (विशेष—प्रथम नाड़ीके आठ नक्षत्र दिशाके नक्षत्र हैं, उन्हींको 'बाह्य' भी कहते हैं। मध्य तथा अन्त नाड़ीवाले नक्षत्रोंको कोटके मध्यका समझना चाहिये।)
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोटचक्रका वर्णन' नामक एक सौ अट्ठाइसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२८॥
* दिशाओंके स्वामीके लिये रामाचार्य 'मुहूर्त-चिन्तामणि' नामक ग्रन्थके यात्रा-प्रकरणमें लिखते हैं— सूर्यः सितो भूमिसुतोऽथ राहुः शनिः शशी ज्ञश्च बृहस्पतिश्च। प्राच्यादितो दिक्षु विदिक्षु चापि दिशामधीशाः क्रमशः प्रदिष्टाः ॥ (११।४७) ‘पूर्वके सूर्य, अग्निकोणके शुक्र, दक्षिणके मङ्गल, नैर्ऋत्यके राहु, पश्चिमके शनि, वायव्यके चन्द्र, उत्तरके बुध, ईशानके बृहस्पति—इस प्रकार क्रमशः दिशाओंके स्वामी कहे गये हैं।
कोटचक्रम्
पूर्व
मे. वृ. मि.
ईशान ┌─────────────────────────────────────────────────────────┐ अग्नि
│ भरणी कृत्तिका आश्लेषा │
│ ┌─────────────────────────────────────────────┐ │
│ │ अश्विनी रोहिणी पुष्य│ │
│ │ ┌─────────────────────────────────┐ │ │
│ │ │ रेवती मृगशिरा पुनर्वसु│ │ │
│ │ │ ┌─────────────────────┐ │ │ │
│ │ │ │ आर्द्रा │ │ │ │
उत्तर │धनिष्ठा│शतभिषा│पू. भा.│ उ.भा. हस्त │उ. फा.│पूर्वाफा.│ मघा │ दक्षिण
म. कु. मी. │ │ │ पू. षा. │ │ │ │ क. सिं. क.
│ │ │ └─────────────────────┘ │ │ │
│ │ │ उ. षा. मूल चित्रा │ │ │
│ │ └─────────────────────────────────┘ │ │
│ │ अभि. ज्येष्ठा स्वाती│ │
│ └─────────────────────────────────────────────┘ │
│ श्रवण अनुराधा विशाखा │
वायु └─────────────────────────────────────────────────────────┘ नैर्ऋति
तु. वृ. ध.
पश्चिम
विशेष— भरणी, कृत्तिका, आश्लेषा, मघा, विशाखा, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा—ये आठ नक्षत्र बाह्य (प्रथम नाड़ी) हैं। अश्विनी, रोहिणी, पुष्य, पू० फा०, स्वाती, ज्येष्ठा, अभि०, शतभिषा—ये मध्यनाड़ीके आठ नक्षत्र हैं। रेवती, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, चित्रा, मूल, उत्तराषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपदा—ये आठ नक्षत्र अन्तनाड़ीके हैं। मध्य तथा अन्तनाड़ीके नक्षत्रोंको 'मध्यके नक्षत्र' कहते हैं। दिशाके नक्षत्रको 'प्रवेशक' कहते हैं। उसके विरुद्ध दिशाके नक्षत्रको 'निर्गम' कहते हैं। जैसे पूर्व प्रवेश तो पश्चिम निर्गम होगा।