भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

* अध्याय १३१ * \hfill २८३


वृद्धि और वृक्षोंमें पुष्प तथा फल अधिक लगते हैं। प्रजा आरोग्य रहती है। पृथ्वी धान्यसे परिपूर्ण हो जाती है। अन्नोंका भाव सस्ता तथा देशमें सुकालका प्रसार हो जाता है, किंतु राजाओंमें परस्पर घोर संग्राम होता रहता है॥ १-१४॥

ज्येष्ठा, रोहिणी, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, उत्तराषाढ़ा, सातवाँ अभिजित्—इन नक्षत्रोंका नाम 'माहेन्द्र मण्डल' है। इसमें यदि पूर्वोक्त उत्पात हों तो प्रजा प्रसन्न रहती है, किसी प्रकारके रोगका भय नहीं रह जाता। राजा लोग आपसमें संधि कर लेते हैं और राजाओंके लिये हितकारक सुभिक्ष होता है॥ १५-१६ $\frac{१}{२}$॥

'ग्राम' दो प्रकारका होता है—पहलेका नाम 'मुखग्राम' है और दूसरेका नाम 'पुच्छग्राम' है। चन्द्र, राहु तथा सूर्य जब एक राशिमें हो जाते हैं, तब उसे 'मुखग्राम' कहते हैं। राहुसे सातवें स्थानको 'पुच्छग्राम' कहते हैं। सूर्यके नक्षत्रसे पंद्रहवें नक्षत्रमें जब चन्द्रमा आता है, उस समय तिथि-साधनके अनुसार 'सोमग्राम' होता है अर्थात् पूर्णिमा तिथि होती है*॥ १७-१९॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विविध मण्डलोंका वर्णन' नामक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३०॥


एक सौ इकतीसवाँ अध्याय

घातचक्र आदिका वर्णन

शंकरजी कहते हैं—पूर्वादि दिशाओंमें प्रदक्षिणक्रमसे अकारादि स्वरोंको लिखे। उसमें शुक्लपक्षकी प्रतिपदा, पूर्णिमा, त्रयोदशी, चतुर्दशी, केवल शुक्लपक्षकी एक अष्टमी (कृष्णपक्षकी अष्टमी नहीं), सप्तमी, कृष्णपक्षमें प्रतिपदासे लेकर त्रयोदशीतक (अष्टमीको छोड़कर) द्वादश तिथियोंका न्यास करे। इस चैत्र-चक्रमें पूर्वादि दिशाओंमें स्पर्श-वर्णोंको लिखनेसे जय-पराजयका तथा लाभका निर्णय होता है। विषम दिशा, विषम स्वर तथा विषम वर्णमें शुभ होता है और सम दिशा आदिमें अशुभ होता है॥ १-३॥

$$\text{चैत्रचक्रम्}$$

$$\begin{array}{ccc} & \text{क ट न ल अ आ} & \ \begin{array}{c} \text{अं अः ईशान} \ \text{र ध झ कृ. १२।१३ ति.} \end{array} & \begin{array}{c} \text{पूर्व} \ \hline \text{शुक्ल १।१३।१४।१५} \end{array} & \begin{array}{c} \text{अग्नि. शु. प. ७।८ ति.} \ \text{इ ई ख ठ प व} \end{array} \ \ \begin{array}{c} \text{ओ औ} \ \text{य ज द} \quad \text{उत्तर} \ \text{कृ. १०।११ ति.} \end{array} & \begin{array}{|c|} \hline \hspace{10em} \ \phantom{\vdots} \ \phantom{\vdots} \ \hline \end{array} & \begin{array}{c} \text{दक्षिण कृ० १।२ ति.} \ \ \text{उ ऊ ग ड फ श} \end{array} \ \ \begin{array}{c} \text{वायु०} \ \text{ए कृ० ७।९ ति.} \ \text{ह छ थ म} \end{array} & \begin{array}{c} \hline \text{पश्चिम} \ \text{कृ. ५।६ ति.} \ \text{लृ ॡ} \ \text{च. त. भ. स.} \end{array} & \begin{array}{c} \text{नैर्ऋ०} \ \text{कृ. ३।४ ति.} \ \text{ऋ ॠ} \ \text{घ ढ ब ष} \end{array} \end{array}$$

इस चक्रमें शुक्लपक्षकी १।७।८।१३।१४।१५ ये तिथियाँ ली गयी हैं। कृष्णपक्षमें अष्टमी छोड़कर १।२।३।४।५।६।७।९।१०।११।१२।१३ ये तिथियाँ ली गयी हैं।


* सूर्यके साथ चन्द्रमा जब रहेगा, तब अमावास्या तिथि होगी। सूर्यके नक्षत्रसे पंद्रहवें नक्षत्रमें चन्द्रमा आयेगा तो सूर्यसे सातवीं राशिमें चन्द्रमा रहेगा; क्योंकि सवा दो नक्षत्रकी एक राशि होती है। जब सूर्यसे सातवीं राशिमें चन्द्रमा रहता है, तब पूर्णिमा ही तिथि होती है। उसे ही 'सोमग्राम' कहते हैं।