अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 320, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय १३५ * २९३
ॐ चामुण्ड एहि, ॐ रेवत्येहि, ओमाकाशरेवत्येहि, ॐ हिमवच्चारिण्येहि, ॐ रुरुमर्दिन्यसुरक्षयंकार्यकाशिगामिनि पाशेन बन्ध बन्ध, अङ्कुशेन कट कट, समये तिष्ठ, ॐ मण्डलं प्रवेशय, ॐ गृह्र, मुखं बन्ध, ॐ चक्षुर्बन्ध हस्तपादौ च बन्ध, दुष्टग्रहान् सर्वान् बन्ध, ॐ दिशो बन्ध, ॐ विदिशो बन्ध, अधस्ताद्वन्ध, ॐ सर्वं बन्ध, ॐ भस्मना पानीयेन वा मृत्तिकया सर्षपैर्वा सर्वानावेशय, ॐ पातय, ॐ चामुण्डे किलि किलि, ॐ विच्चे हुं फट् स्वाहा ॥
ॐ ह्रीं चामुण्डे देवि! आप श्मशानमें वास करनेवाली हैं। आपके हाथमें खट्वाङ्ग और कपाल शोभा पाते हैं। आप महान् प्रेतपर आरूढ़ हैं। आप बड़े-बड़े विमानोंसे घिरी हुई हैं। आप ही कालरात्रि हैं। बड़े-बड़े पार्षदगण आपको घेरकर खड़े हैं। आपका मुख विशाल है। भुजाएँ बहुत हैं। घण्टा, डमरू और घुँघुरू बजाकर विकट अट्टहास करनेवाली देवि! क्रीड़ा कीजिये, क्रीड़ा कीजिये। ॐ हूं फट्। आप अपनी दाढ़ोंसे घोर अन्धकार प्रकट करनेवाली हैं। आपका गम्भीर घोष और शब्द अधिक मात्रामें अभिव्यक्त होता है। आपका विग्रह हाथीके चमड़ेसे ढका हुआ है। शत्रुओंके मांससे परिपुष्ट हुई देवि! आपकी भयानक जिह्वा लपलपा रही है। महाराक्षसि! भयंकर दाढ़ोंके कारण आपकी आकृति बड़ी विकराल दिखायी देती है। आपका अट्टहास बड़ा भयानक है। आपकी कान्ति चमकती हुई बिजलीके समान है। आप संग्राममें विजय दिलानेके लिये चलिये, चलिये। ॐ चकोरनेत्रे (चकोरके समान नेत्रोंवाली)! चिलि, चिलि। ॐ ललज्जिह्वे (लपलपाती हुई जीभवाली)! ॐ भीं टेढ़ी भौंहोंसे युक्त मुखवाली! आप हुंकारमात्रसे ही भय और त्रास उत्पन्न करनेवाली हैं। आप नरमुण्डोंकी मालासे वेष्टित जटा-मुकुटमें चन्द्रमाको धारण करती हैं। विकट अट्टहासवाली देवि! किलि, किलि (रणभूमिमें क्रीड़ा करो, क्रीड़ा करो)। ॐ हूं दाढ़ोंसे घोर अन्धकार प्रकट करनेवाली और सम्पूर्ण विघ्नोंका नाश करनेवाली देवि! आप मेरे इस कार्यको सिद्ध करें, सिद्ध करें। ॐ शीघ्र कीजिये, कीजिये। ॐ फट्। ॐ अङ्कुशसे शान्त कीजिये, प्रवेश कराइये। ॐ रक्तसे रँगिये, रँगिये; कँपाइये, कँपाइये। ॐ विचलित कीजिये। ॐ रुधिर-मांस-मद्यप्रिये! शत्रुओंका हनन कीजिये, हनन कीजिये। ॐ विपक्षी योद्धाओंको कूटिये, कूटिये। ॐ काटिये। ॐ मारिये। ॐ उनका पीछा कीजिये। ॐ वज्रतुल्य शरीरवालेको भी मार गिराइये। ॐ त्रिलोकीमें विद्यमान जो शत्रु है, वह दुष्ट हो या अदुष्ट, पकड़ा गया हो या नहीं, आप उसे आविष्ट कीजिये। ॐ नृत्य कीजिये। ॐ वन्द। ॐ कोटराक्षि (खोंखलेके समान नेत्रवाली)! ऊर्ध्वकेशि (ऊपर उठे हुए केशोंवाली)! उलूकवदने (उल्लूके समान मुँहवाली)! हड्डियोंकी ठटरी या खोपड़ी धारण करनेवाली! खोपड़ीकी माला धारण करनेवाली चामुण्डे! आप शत्रुओंको जलाइये। ॐ पकाइये, पकाइये। ॐ पकड़िये। ॐ मण्डलके भीतर प्रवेश कराइये। ॐ आप क्यों विलम्ब करती हैं? ब्रह्माके सत्यसे, विष्णुके सत्यसे, रुद्रके सत्यसे तथा ऋषियोंके सत्यसे आविष्ट कीजिये। ॐ किलि किलि। ॐ ख्विलि ख्विलि। विलि विलि। ॐ विकृत रूप धारण करनेवाली देवि! आपके शरीरमें काले सर्प लिपटे हुए हैं। आप सम्पूर्ण ग्रहोंको आविष्ट करनेवाली हैं। आपके लंबे-लंबे ओठ लटक रहे हैं। आपकी टेढ़ी भौंहें नासिकासे लगी हैं। आपका मुख विकट है। आपकी जटा कपिलवर्णकी है। आप ब्रह्माकी शक्ति हैं। आप शत्रुओंको भङ्ग कीजिये। ॐ ज्वालामुखि! गर्जना कीजिये। ॐ