भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 878 में से

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पृष्ठ 331

३०४ * अग्निपुराण *


तिथि-राहुकी सम्मुख दृष्टिका भी त्याग करे। राहुकी दृष्टि सामने हो तो हानि होती है; अन्यथा विजय प्राप्त होती है॥ १०–१३॥

अब 'विष्टि-राहु' का वर्णन करता हूँ। निम्नाङ्कित रूपसे आठ रेखाएँ खींचे—ईशानकोणसे दक्षिण दिशातक, दक्षिण दिशासे वायव्यकोणतक, वायव्यकोणसे पूर्व दिशातक, वहाँसे नैर्ऋत्यकोणतक, नैर्ऋत्यकोणसे उत्तर दिशातक, उत्तर दिशासे अग्निकोणतक, अग्निकोणसे पश्चिम दिशातक तथा पश्चिम दिशासे ईशानकोणतक। इन रेखाओंपर विष्टि (भद्रा)-के साथ महाबली राहु विचरण करते हैं। कृष्णपक्षकी तृतीयादि तिथियोंमें विष्टि-राहुकी स्थिति ईशानकोणमें होती है और सप्तमी आदि तिथियोंमें दक्षिण दिशामें। (इसी प्रकार शुक्लपक्षकी अष्टमी आदिमें उनकी स्थिति नैर्ऋत्यकोणमें होती है और चतुर्थी आदिमें उत्तर दिशामें)। इस तरह कृष्ण एवं शुक्लपक्षमें वायुके आश्रित रहनेवाले सम्मुख राहु शत्रुओंका नाश करते हैं।* विष्टि-राहुचक्रकी पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्र आदि आठ दिक्पालों, महाभैरव आदि आठ


* विष्टि-राहुचक्र इस प्रकार समझना चाहिये—

                    कृष्ण पक्ष
                      दशमी
                       पू०
                      /\
            तृतीया   /  \    सप्तमी
              ई०   /    \    अ०
                 /        \
                /          \
      चतुर्थी  /            \  चतुर्दशी
        उ०   /              \   द०
             \              /
              \            /
               \          /
       एकादशी   \        /   अष्टमी
         वा०     \      /     नै०
                  \    /
                   \  /
                    \/
                    प०
                  पूर्णिमा
                  शुक्ल पक्ष

(चक्रके आठों कोष्ठकों/बिन्दुओंपर दिशाएँ एवं तिथियाँ अङ्कित हैं: पूर्व—दशमी, अग्नि—सप्तमी, दक्षिण—चतुर्दशी, नैर्ऋत्य—अष्टमी, पश्चिम—पूर्णिमा, वायव्य—एकादशी, उत्तर—चतुर्थी, ईशान—तृतीया)