भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 395

३६८ * अग्निपुराण *

करे। यह 'सौभाग्य-तृतीया' व्रत कहा गया, जो पार्वती आदिके लोकोंको प्रदान करनेवाला है। इसी प्रकार माघ, भाद्रपद और वैशाखकी तृतीयाको व्रत करना चाहिये॥ २२-२६॥

चैत्रमें 'दमनक-तृतीया' का व्रत करके पार्वतीकी 'दमनक' नामक पुष्पोंसे पूजन करनी चाहिये। मार्गशीर्षमें 'आत्म-तृतीया' का व्रत किया जाता है। इसमें पार्वतीका पूजन करके ब्राह्मणको इच्छानुसार भोजन करावे। मार्गशीर्षकी तृतीयासे आरम्भ करके, क्रमशः पौष आदि मासोंमें उपर्युक्त व्रतका अनुष्ठान करके निम्नलिखित नामोंको 'प्रीयताम्' से संयुक्त करके, कहे— गौरी, काली, उमा, भद्रा, दुर्गा, कान्ति, सरस्वती, वैष्णवी, लक्ष्मी, प्रकृति, शिवा और नारायणी। इस प्रकार व्रत करनेवाला सौभाग्य और स्वर्गको प्राप्त करता है॥ २७-२८॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'तृतीयाके व्रतोंका वर्णन' नामक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७८॥


एक सौ उनासीवाँ अध्याय

चतुर्थी तिथिके व्रत

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं आपके सम्मुख भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले चतुर्थी-सम्बन्धी व्रतोंका वर्णन करता हूँ। माघके शुक्लपक्षकी चतुर्थीको उपवास करके गणेशका पूजन करे। तदनन्तर पञ्चमीको तिलका भोजन करे। ऐसा करनेसे मनुष्य बहुत वर्षोंतक विघ्नरहित होकर सुखी रहता है। 'गं स्वाहा।'—यह मूलमन्त्र है। 'गां नमः।' आदिसे हृदयादिका न्यास करे*॥ १-२॥

'आगच्छोल्काय' कहकर गणेशका आवाहन और 'गच्छोल्काय' कहकर विसर्जन करे। इस प्रकार आदिमें गकारयुक्त और अन्तमें 'उल्का' शब्दयुक्त मन्त्रसे उनके आवाहनादि कार्य करे। गन्धादि उपचारों एवं लड्डुओं आदिद्वारा गणपतिका पूजन करे॥ ३॥ (तदनन्तर निम्नलिखित गणेश-गायत्रीका जप करे—)

ॐ महोल्काय विद्महे वक्रतुण्डायधीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥

भाद्रपदके शुक्लपक्षकी चतुर्थीको व्रत करनेवाला शिवलोकको प्राप्त करता है। 'अङ्गारक-चतुर्थी' (मङ्गलवारसे युक्त चतुर्थी) - को गणेशका पूजन करके मनुष्य सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है। फाल्गुनकी चतुर्थीको रात्रिमें ही भोजन करे। यह 'अविघ्ना चतुर्थी' के नामसे प्रसिद्ध है। चैत्र मासकी चतुर्थीको 'दमनक' नामक पुष्पोंसे गणेशका पूजन करके मनुष्य सुख-भोग प्राप्त करता है॥ ४-६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'चतुर्थीके व्रतोंका कथन' नामक एक सौ उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १७९॥


* निम्नलिखित विधिसे हृदयादि षडङ्गोंका न्यास करे—
'गां हृदयाय नमः। गीं शिरसे स्वाहा। गूं शिखायै वषट्। गैं नेत्रत्रयाय वौषट्॥ गौं कवचाय हुम्। गः अस्त्राय फट्।'