भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 878 में से

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पृष्ठ 404

* अध्याय १९१ * ३७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

हैं। भगवान् वामन नित्य सभी द्रव्योंमें स्थित हैं। उन श्रीवामनावतार विष्णुको नमस्कार है, नमस्कार है।'इस प्रकार ब्राह्मणको दक्षिणासहित पूजन-द्रव्य देकर ब्राह्मणोंको भोजन कराके स्वयं भोजन करे॥ १४-१५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'श्रवणद्वादशी व्रतका वर्णन' नामक एक सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८९॥


एक सौ नब्बेवाँ अध्याय

अखण्डद्वादशी-व्रतका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—अब मैं 'अखण्डद्वादशी'-व्रतके विषयमें कहता हूँ, जो समस्त व्रतोंकी सम्पूर्णताका सम्पादन करनेवाली है। मार्गशीर्षके शुक्लपक्षकी द्वादशीको उपवास करके भगवान् श्रीविष्णुका पूजन करे। व्रत करनेवाला मनुष्य पञ्चगव्य-मिश्रित जलसे स्नान करे और उसीका पारण करे। इस द्वादशीको ब्राह्मणको जौ और धानसे भरा हुआ पात्र दान दे। भगवान् श्रीविष्णुके सम्मुख इस प्रकार प्रार्थना करे—'भगवन्! सात जन्मोंमें मेरे द्वारा जो व्रत खण्डित हुआ हो, आपकी कृपासे वह मेरे लिये अखण्ड फलदायक हो जाय। पुरुषोत्तम! जैसे आप इस अखण्डचराचर विश्वके रूपमें स्थित हैं, उसी प्रकार मेरे किये हुए समस्त व्रत अखण्ड हो जायँ।' इस प्रकार (मार्गशीर्षसे आरम्भ करके फाल्गुनतक) प्रत्येक मासमें करना चाहिये। इस व्रतको चार महीनेतक करनेका विधान है। चैत्रसे आषाढ़पर्यन्त यह व्रत करनेपर सत्तूसे भरा हुआ पात्र दान करे। श्रावणसे प्रारम्भ करके इस व्रतको कार्तिकमें समाप्त करना चाहिये। उपर्युक्त विधिसे 'अखण्डद्वादशी' का व्रत करनेपर सात जन्मोंके खण्डित व्रतोंको यह सफल बना देता है। इसके करनेसे मनुष्य दीर्घ आयु, आरोग्य, सौभाग्य, राज्य और विविध भोग आदि प्राप्त करता है॥ १-६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अखण्डद्वादशी-व्रतका वर्णन' नामक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९०॥


एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय

त्रयोदशी तिथिके व्रत

अग्निदेव कहते हैं—अब मैं त्रयोदशी तिथिके व्रत कहता हूँ, जो सब कुछ देनेवाले हैं। पहले मैं 'अनङ्गत्रयोदशी'के विषयमें बतलाता हूँ। पूर्वकालमें अनङ्ग (कामदेव)-ने इसका व्रत किया था। मार्गशीर्ष शुक्ला त्रयोदशीको कामदेवस्वरूप 'हर' की पूजा करे। रात्रिमें मधुका भोजन करे तथा तिल और अक्षत-मिश्रित घृतका होम करे। पौषमें 'योगेश्वर'कापूजन एवं होम करके चन्दनका प्राशन करे। माघमें 'महेश्वर'की अर्चना करके मौक्तिक (रास्ना नामक पौधेके) जलका आहार करे। इससे मनुष्य स्वर्गलोकको प्राप्त करता है। व्रत करनेवाला फाल्गुनमें 'वीरभद्र' का पूजन करके कङ्कोलका प्राशन करे। चैत्रमें 'सुरूप' नामक शिवकी अर्चना करके कर्पूरका आहार करनेवाला मनुष्य सौभाग्ययुक्त होता है। वैशाखमें 'महारूप' की