भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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३८४ * अग्निपुराण *


धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंको हस्तगत कर लेता है। मासोपवास व्रत करनेवाला श्रीविष्णुका पूजन करके सब कुछ प्राप्त कर लेता है॥ १३—१६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'मास-सम्बन्धी व्रतका वर्णन' नामक एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९८॥


एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय

ऋतु, वर्ष, मास, संक्रान्ति आदि विभिन्न व्रतोंका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं आपके सम्मुख ऋतु-सम्बन्धी व्रतोंका वर्णन करता हूँ, जो भोग और मोक्षको सुलभ करनेवाले हैं। जो वर्षा, शरद्, हेमन्त और शिशिर ऋतुमें इन्धनका दान करता है एवं व्रतान्तमें घृत-धेनुका दान करता है, वह 'अग्निव्रत'का पालन करनेवाला मनुष्य दूसरे जन्ममें ब्राह्मण होता है। जो एक मासतक संध्याके समय मौन रहकर मासान्तमें ब्राह्मणको घृतकुम्भ, तिल, घण्टा और वस्त्र देता है, वह 'सारस्वतव्रत' करनेवाला मनुष्य सुखका उपभोग करता है। एक वर्षतक पञ्चामृतसे स्नान करके गोदान करनेवाला राजा होता है॥ १—३॥

चैत्रकी एकादशीको नक्तभुक्तव्रत करके चैत्रके समाप्त होनेपर विष्णुभक्त ब्राह्मणको स्वर्णमयी विष्णु-प्रतिमाका दान करे। इस विष्णु-सम्बन्धी उत्तम व्रतका पालन करनेवाला विष्णुपदको प्राप्त करता है। (एक वर्षतक) खीरका भोजन करके गोयुग्मका दान करनेवाला इस 'देवीव्रत'के पालनके प्रभावसे श्रीसम्पन्न होता है। जो (एक वर्षतक) पितृदेवोंको समर्पित करके भोजन करता है, वह राज्य प्राप्त करता है। ये वर्ष-सम्बन्धी व्रत कहे गये। अब मैं संक्रान्ति-सम्बन्धी व्रतोंका वर्णन करता हूँ। मनुष्य संक्रान्तिकी रात्रिको जागरण करनेसे स्वर्गलोकको प्राप्त होता है। जब संक्रान्ति अमावास्या तिथिमें हो तो शिव और सूर्यका पूजन करनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। उत्तरायण-सम्बन्धी मकर-संक्रान्तिमें प्रातःकाल स्नान करके भगवान् श्रीकेशवकी अर्चना करनी चाहिये। उद्यापनमें बत्तीस पल स्वर्णका दान देकर वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। विषुव आदि योगोंमें भगवान् श्रीहरिको घृतमिश्रित दुग्ध आदिसे स्नान कराके मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर लेता है॥ ४—८॥

स्त्रियोंके लिये 'उमाव्रत' लक्ष्मी प्रदान करनेवाला है। उन्हें तृतीया और अष्टमी तिथिको गौरीशंकरकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार शिव-पार्वतीकी अर्चना करके नारी अखण्ड सौभाग्य प्राप्त करती है और उसे कभी पतिका वियोग नहीं होता। 'मूलव्रत' एवं 'उमेश-व्रत' करनेवाली तथा सूर्यमें भक्ति रखनेवाली स्त्री दूसरे जन्ममें अवश्य पुरुषत्व प्राप्त करती है॥ ९—११॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विभिन्न व्रतोंका वर्णन' नामक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९९॥


दो सौवाँ अध्याय

दीपदान-व्रतकी महिमा एवं विदर्भराजकुमारी ललिताका उपाख्यान

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! अब मैं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले 'दीपदान-व्रत'का वर्णन करता हूँ। जो मनुष्य देवमन्दिर अथवा ब्राह्मणके गृहमें एक वर्षतक दीपदान करता है,