अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 427, कुल 878 में से
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दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय
नाना प्रकारके दानोंका वर्णन
अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! जिसके पास दस गौएँ हों, वह एक गौ; जिसके पास सौ गौएँ हों, वह दस गौएँ; जिसके पास एक हजार गौएँ हों, वह सौ गौओंका दान करे तो उन सबको समान फल प्राप्त होता है। कुबेरकी राजधानी अलकापुरी, जहाँ स्वर्णनिर्मित भवन हैं एवं जहाँ गन्धर्व और अप्सराएँ विहार करती हैं, सहस्र गौओंका दान करनेवाले वहीं जाते हैं। मनुष्य सौ गौओंका दान करके नरक-समुद्रसे मुक्त हो जाता है और बछियाका दान करके स्वर्गलोकमें पूजित होता है। गोदानसे दीर्घायु, आरोग्य, सौभाग्य और स्वर्गकी प्राप्ति होती है। 'जो इन्द्र आदि लोकपालोंकी मङ्गलमयी राजमहिषी हैं, वे देवी इस महिषीदानके माहात्म्यसे मुझे सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करें। जिनका पुत्र धर्मराजकी सहायतामें नियुक्त है एवं जो महिषासुरकी जननी हैं, वे देवी मुझे वर प्रदान करें।' उपर्युक्त मन्त्र पढ़कर महिषीदान करनेसे सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। वृषदानसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है॥ १—६॥
'संयुक्त हलपङ्क्ति' नामक दान समस्त फलोंको प्रदान करता है। काठके बने हुए दस हलोंकी पङ्क्ति, जो सुवर्णमय पट्टेसे परस्पर जुड़ी हो और प्रत्येक हलके साथ आवश्यक संख्यामें बैल भी हों तो उसका दान 'संयुक्त हलपङ्क्ति' नामक दान कहा गया है। वह दान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें पूजित होता है। ज्येष्ठपुष्कर-तीर्थमें दस कपिला गौओंका दान किया जाय तो उसका फल अक्षय बतलाया गया है। वृषोत्सर्ग करनेसे भी अक्षय फलकी प्राप्ति होती है। साँड़को चक्र और त्रिशूलसे अङ्कित करके यह मन्त्र पढ़कर छोड़े— 'देवेश्वर! तुम चार चरणोंसे युक्त साक्षात् धर्म हो। ये तुम्हारी चार प्रियतमाएँ हैं। पितरों, मनुष्यों और ऋषियोंका पोषण करनेवाले वेदमूर्ति वृष! तुम्हारे मोचनसे मुझे अमृतमय शाश्वत लोकोंकी प्राप्ति हो। मैं देवऋण, भूतऋण, पितृऋण एवं मनुष्यऋणसे मुक्त हो जाऊँ। तुम साक्षात् धर्म हो; तुम्हारा आश्रय ग्रहण करनेवालोंको जो गति प्राप्त होती हो, वह नित्य गति मुझे भी प्राप्त हो'॥ ७—११$\frac{१}{२}$॥
जिस मृत व्यक्तिके एकादशाह, षाण्मासिक अथवा वार्षिक श्राद्धमें वृषोत्सर्ग किया जाता है, वह प्रेतलोकसे मुक्त हो जाता है। दस हाथके डंडेसे तीस डंडेके बराबरकी भूमिको 'निवर्तन' कहते हैं। दस निवर्तन भूमिकी 'गोचर्म' संज्ञा है। इतनी भूमिका दान करनेवाला मनुष्य अपने समस्त पापोंका नाश कर देता है। जो गौ, भूमि और सुवर्णयुक्त कृष्णमृगचर्मका दान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंके करनेपर भी ब्रह्माका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। तिल एवं मधुसे भरा पात्र मगधदेशीय मानके अनुसार एक प्रस्थ (चौंसठ पल) कृष्णतिलका दान करे। इसके साथ उत्तम गुणोंसे युक्त शय्या देनेसे दाताको भोग और मोक्षकी प्राप्ति होती है॥ १२—१६॥
अपनी स्वर्णमयी प्रतिमा बनवाकर दान करनेवाला स्वर्गमें जाता है। विशाल गृहका निर्माण कराके उसका दान देनेवाला भोग एवं मोक्ष—दोनोंको प्राप्त करता है। गृह, मठ, सभाभवन (धर्मशाला) एवं आवासस्थानका दान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाकर सुख भोगता है। गोशाला बनवाकर दान करनेवाला पापरहित होकर स्वर्गको प्राप्त होता है। यम-देवता-सम्बन्धी महिषदान करनेसे मनुष्य निष्पाप होकर स्वर्गलोकको जाता है। देवताओंसहित ब्रह्मा,