भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 434
  • अध्याय २१४ * ४०७

‘व्यान’ अङ्गोंको पीड़ित करता है। यही व्याधिको कुपित करता है और कण्ठको अवरुद्ध कर देता है। व्यापनशील होनेसे इसे ‘व्यान’ कहा गया है। ‘नागवायु’ उद्गार (डकार-वमन आदि)-में और ‘कूर्मवायु’ नयनोंके उन्मीलन (खोलने)-में प्रवृत्त होता है। ‘कृकर’ भक्षणमें और ‘देवदत्त’ वायु जँभाईमें अधिष्ठित है। ‘धनंजय’ पवनका स्थान घोष है। यह मृत शरीरका भी परित्याग नहीं करता। इन दसोंद्वारा जीव प्रयाण करता है, इसलिये प्राणभेदसे नाड़ीचक्रके भी दस भेद हैं॥ १—१४॥

संक्रान्ति, विषुव, दिन, रात, अयन, अधिमास, ऋण, ऊनरात्र एवं धन—ये सूर्यकी गतिसे होनेवाली दस दशाएँ शरीरमें भी होती हैं। इस शरीरमें हिक्का (हिचकी) ऊनरात्र, विजृम्भिका (जँभाई) अधिमास, कास (खाँसी) ऋण और निःश्वास ‘धन’ कहा जाता है। शरीरगत वामनाड़ी ‘उत्तरायण’ और दक्षिणनाड़ी ‘दक्षिणायन’ है। दोनोंके मध्यमें नासिकाके दोनों छिद्रोंसे निर्गत होनेवाली श्वासवायु ‘विषुव’ कहलाती है। इस विषुववायुका ही अपने स्थानसे चलकर दूसरे स्थानसे युक्त होना ‘संक्रान्ति’ है। द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठ! शरीरके मध्यभागमें ‘सुषुम्णा’ स्थित है, वामभागमें ‘इड़ा’ और दक्षिणभागमें ‘पिङ्गला’ है। ऊर्ध्वगतिवाला प्राण ‘दिन’ माना गया है और अधोगामी अपानको ‘रात्रि’ कहा गया है। एक प्राणवायु ही दस वायुके रूपमें विभाजित है। देहके भीतर जो प्राणवायुका आयाम (बढ़ना) है, उसे ‘चन्द्रग्रहण’ कहते हैं। वही जब देहसे ऊपरतक बढ़ जाता है, तब उसे ‘सूर्यग्रहण’ मानते हैं॥ १५—२०॥

साधक अपने उदरमें जितनी वायु भरी जा सके, भर ले। यह देहको पूर्ण करनेवाला, ‘पूरक’ प्राणायाम है। श्वास निकलनेके सभी द्वारोंको रोककर, श्वासोच्छ्वासकी क्रियासे शून्य हो परिपूर्ण कुम्भकी भाँति स्थित हो जाय—इसे ‘कुम्भक’ प्राणायाम कहा जाता है। तदनन्तर मन्त्रवेत्ता साधक ऊपरकी ओर एक ही नासारन्ध्रसे वायुको निकाले। इस प्रकार उच्छ्वासयोगसे युक्त हो वायुका ऊपरकी ओर विरेचन (निःसारण) करे (यह ‘रेचक’ प्राणायाम है)। यह श्वासोच्छ्वासकी क्रियाद्वारा अपने शरीरमें विराजमान शिवस्वरूप ब्रह्मका ही (‘सोऽहं’ ‘हंसः’के रूपमें) उच्चारण होता है, अतः तत्त्ववेत्ताओंके मतमें वही ‘जप’ कहा गया है। इस प्रकार एक तत्त्ववेत्ता योगीन्द्र श्वास-प्रश्वासद्वारा दिन-रातमें इक्कीस हजार छः सौकी संख्यामें मन्त्र-जप करता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वरसे सम्बन्ध रखनेवाली ‘अजपा’ नामक गायत्री है। जो इस अजपाका जप करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। चन्द्रमा, अग्नि तथा सूर्यसे युक्त मूलाधार-निवासिनी आद्या कुण्डलिनी-शक्ति हृदयप्रदेशमें अंकुरके आकारमें स्थित है। सात्त्विक पुरुषोंमें उत्तम वह योगी सृष्टिक्रमका अवलम्बन करके सृष्टिन्यास करे तथा ब्रह्मरन्ध्रवर्ती शिवसे कुण्डलिनीके मुखभागमें झरते हुए अमृतका चिन्तन करे। शिवके दो रूप हैं—सकल और निष्कल। सगुण साकार देहमें विराजित शिवको ‘सकल’ जानना चाहिये और जो देहसे रहित हैं, वे ‘निष्कल’ कहे गये हैं। वे ‘हंस-हंस’का जप करते हैं। ‘हंस’ नाम है—‘सदाशिव’का। जैसे तिलोंमें तेल और पुष्पोंमें गन्धकी स्थिति है, उसी प्रकार अन्तर्यामी पुरुष (जीवात्मा)-में बाहर और भीतर भी सदाशिवका निवास है। ब्रह्माका स्थान हृदयमें है, भगवान् विष्णु कण्ठमें अधिष्ठित हैं, तालुके मध्यभागमें रुद्र, ललाटमें महेश्वर और प्राणोंके अग्रभागमें सदाशिवका स्थान है। उनके अन्तमें परात्पर ब्रह्म विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, महेश्वर और सदाशिव—इन पाँच रूपोंमें ‘सकल’ (साकार या सगुण) परमात्माका वर्णन किया गया है। इसके विपरीत परमात्मा,