भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 438
  • अध्याय २१६ * ४११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

जलके भीतर ‘ऋतं च०’—इस अघमर्षण-मन्त्रका तीन बार जप करे$^१$।

‘आपो हि ष्ठा’ आदि तीन ऋचाओंके सिन्धुद्वीप ऋषि, गायत्री छन्द और जल देवता माने गये हैं। ब्राह्मस्नानके लिये मार्जनमें इसका विनियोग किया जाता है$^२$।

(अघमर्षण-मन्त्रका विनियोग इस प्रकार करना चाहिये—) इस अघमर्षण-सूक्तके अघमर्षण ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और भाववृत्त देवता हैं। पापनिसारणके कर्ममें इसका प्रयोग किया जाता है$^३$।

‘ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।’ यह गायत्री-मन्त्रका शिरोभाग है। इसके प्रजापति ऋषि हैं। यह छन्दरहित यजुर्मन्त्र है; क्योंकि यजुर्वेदके मन्त्र किसी नियत अक्षरवाले छन्दमें आबद्ध नहीं हैं। शिरोमन्त्रके ब्रह्मा, अग्नि, वायु और सूर्य देवता माने गये हैं$^४$। प्राणायामसे वायु, वायुसे अग्नि और अग्निसे जलकी उत्पत्ति होती है तथा उसी जलसे शुद्धि होती है। इसलिये जलका आचमन निम्नलिखित मन्त्रसे करे—

अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वमूर्त्तिषु। तपो यज्ञो वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्$^५$॥

‘उदुत्यं जातवेदसं०’—इस मन्त्रके प्रस्कण्व ऋषि कहे गये हैं। इसका गायत्री छन्द और सूर्य देवता हैं। इसका अतिरात्र और अग्निष्टोम-यागमें विनियोग होता है (परंतु संध्योपासनामें इसका सूर्योपस्थान-कर्ममें विनियोग किया जाता है$^६$)।

‘चित्रं देवानां०’—इस ऋचाके कौत्स ऋषि कहे गये हैं। इसका छन्द त्रिष्टुप् और देवता सूर्य माने गये हैं। यहाँ इसका भी विनियोग सूर्योपस्थानमें ही है$^७$॥ ४२—५०॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘संध्याविधिक वर्णन’ नामक दो सौ पन्द्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१५॥


दो सौ सोलहवाँ अध्याय

गायत्री-मन्त्रके तात्पर्यार्थका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं— वसिष्ठ! इस प्रकार संध्याका विधान करके गायत्रीका जप और स्मरण करे। यह अपना गान करनेवाले साधकोंके शरीर और प्राणोंका त्राण करती है, इसलिये इसे ‘गायत्री’ कहा गया है। सविता (सूर्य)-से इसका प्रकाशन—प्राकट्य हुआ है, इसलिये यह ‘सावित्री’ कहलाती है। वाक्स्वरूपा होनेसे ‘सरस्वती’ नामसे भी प्रसिद्ध है॥ १-२॥

‘तत्’ पदसे ज्योतिःस्वरूप परब्रह्म परमात्मा अभिहित है। ‘भर्गः’ पद तेजका वाचक है; क्योंकि ‘भा’ धातु दीप्त्यर्थक है और उसीसे ‘भर्ग’ शब्द सिद्ध है। ‘भातीति भर्गः’—इस प्रकार इसकी व्युत्पत्ति है। अथवा ‘भ्रस्ज पाके’—इस धातुसूत्रके अनुसार पाकार्थक ‘भ्रस्ज’ धातुसे


१. ॐ ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः। समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरो अजायत। अहो रात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्वः॥
२. आपो हिष्ठेत्यादि तृचस्य सिन्धुद्वीप ऋषिः, गायत्री छन्दः, आपो देवता ब्राह्मस्नानाय मार्जने विनियोगः।
३. अघमर्षणसूक्तस्याघमर्षण ऋषिरनुष्टुपूछन्दो भाववृत्तो देवता अघमर्षणे विनियोगः।
४. शिरसः प्रजापतिर्ऋषिस्त्रिपदा गायत्री छन्दो ब्रह्माग्निवायुसूर्या देवता यजुः प्राणायामे विनियोगः।
५. इसका पाठ आजकलकी संध्याप्रतियोंमें इस प्रकार उपलब्ध होता है—
ॐ अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतम्॥
६. उदुत्यमिति प्रस्कण्व ऋषिर्गायत्री छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः।
७. चित्रमित्यस्य कौत्स ऋषिस्त्रिष्टुपूछन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः।