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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 501, कुल 878 में से

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पृष्ठ 501

४७४ * अग्निपुराण *


उरस्यकी संख्या दुगुनी हो, वह ‘शकट-व्यूह’ है। इसके विपरीत स्थितिमें स्थित व्यूह ‘मकर’ कहलाता है। इन दोनों व्यूहोंमेंसे किसीके भी मध्यभागमें हाथी और घोड़े आदि आवाप मिला दिये जायँ तो वह ‘परिपतन्तिक’ नामक व्यूह होता है॥ ५५-५६$\frac{१}{२}$॥

मण्डल-व्यूहके दो ही भेद हैं—सर्वतोभद्र तथा दुर्जय। जिस मण्डलाकार व्यूहका सब ओर मुख हो, उसे ‘सर्वतोभद्र’ कहा गया है। इसमें पाँच अनीक सेना होती है। इसीमें आवश्यकतावश उरस्य तथा दोनों कक्षोंमें एक-एक अनीक बढ़ा देनेपर आठ अनीकका ‘दुर्जय’ नामक व्यूह बन जाता है। अर्धचन्द्र, उड्डान तथा वज्र—ये ‘असंहत’ के भेद हैं। इसी तरह कर्कटशृङ्गी, काकपादी और गोधिका भी असंहतके ही भेद हैं। अर्धचन्द्र तथा कर्कटशृङ्गी—ये तीन अनीकोंके व्यूह हैं, उड्डान और काकपादी—ये चार अनीक सेनाओंसे बननेवाले व्यूह हैं तथा वज्र एवं गोधिका—ये दो व्यूह पाँच अनीक सेनाओंके संघटनसे सिद्ध होते हैं। अनीककी दृष्टिसे तीन ही भेद होनेपर भी आकृतिमें भेद होनेके कारण ये छः बताये गये हैं। दण्डसे सम्बन्ध रखनेवाले १७, मण्डलके २, असंहतके ६ और भोगके समराङ्गणमें ५ भेद कहे गये हैं॥ ५७—६०॥

पक्ष आदि अङ्गोंमेंसे किसी एक अङ्गकी सेनाद्वारा शत्रुके व्यूहका भेदन करके शेष अनीकोंद्वारा उसे घेर ले अथवा उरस्यगत अनीकसे शत्रुके व्यूहपर आघात करके दोनों कोटियों (प्रपक्षों)-द्वारा घेरे। शत्रुसेनाकी दोनों कोटियों (प्रपक्षों)-पर अपने व्यूहके पक्षोंद्वारा आक्रमण करके शत्रुके जघन (प्रोरस्य) भागको अपने प्रतिग्रह तथा दोनों कोटियोंद्वारा नष्ट करे। साथ ही, उरस्यगत सेनाद्वारा शत्रुपक्षको पीड़ा दे। व्यूहके जिस भागमें सारहीन सैनिक हों, जहाँ सेनामें फूट या दरार पड़ गयी हो तथा जिस भागमें दूष्य (क्रुद्ध, लुब्ध आदि) सैनिक विद्यमान हों, वहीं-वहीं शत्रुसेनाका संहार करे और अपने पक्षके वैसे स्थानोंको सबल बनाये। बलिष्ठ सेनाको उससे भी अत्यन्त बलिष्ठ सेनाद्वारा पीड़ित करे। निर्बल सैन्यदलको सबल सैन्यद्वारा दबाये। यदि शत्रुसेना संघटितभावसे स्थित हो तो प्रचण्ड गजसेनाद्वारा उस शत्रुवाहिनीका विदारण करे॥ ६१—६४॥

पक्ष, कक्ष और उरस्य—ये सम स्थितिमें वर्तमान हों तो ‘दण्डव्यूह’ होता है। दण्डका प्रयोग और स्थान व्यूहके चतुर्थ अङ्गद्वारा प्रदर्शित करे। दण्डके समान ही दोनों पक्ष यदि आगेकी ओर निकले हों तो ‘प्रदर’ या ‘प्रदारक’ व्यूह बनता है। वही यदि पक्ष-कक्षद्वारा अतिक्रान्त (आगेकी ओर निकला) हो तो ‘दृढ़’ नामक व्यूह होता है। यदि दोनों पक्षमात्र आगेकी ओर निकले हों तो वह व्यूह ‘असह्य’ नाम धारण करता है। कक्ष और पक्षको नीचे स्थापित करके उरस्यद्वारा निर्गत व्यूह ‘चाप’ कहलाता है। दो दण्ड मिलकर एक ‘वलय-व्यूह’ बनाते हैं। यह व्यूह शत्रुको विदीर्ण करनेवाला होता है। चार वलय-व्यूहोंके योगसे एक ‘दुर्जय’ व्यूह बनता है, जो शत्रुवाहिनीका मर्दन करनेवाला होता है।

कक्ष, पक्ष तथा उरस्य जब विषमभावसे स्थित हों तो ‘भोग’ नामक व्यूह होता है। इसके पाँच भेद हैं—सर्पचारी, गोमूत्रिका, शकट, मकर और परिपतन्तिक। सर्प-संचरणकी आकृतिसे सर्पचारी, गोमूत्रके आकारसे गोमूत्रिका, शकटकी-सी आकृतिसे शकट तथा इसके विपरीत स्थितिसे मकर-व्यूहका सम्पादन होता है। यह भेदोंसहित ‘भोग-व्यूह’ सम्पूर्ण शत्रुओंका मर्दन करनेवाला है। चक्रव्यूह तथा पद्मव्यूह आदि मण्डलके भेद-प्रभेद हैं। इसी प्रकार सर्वतोभद्र, वज्र, अक्षवर, काक, अर्धचन्द्र, शृङ्गार और अचल आदि व्यूह भी हैं। इनकी आकृतिके ही अनुसार ये नाम रखे गये हैं। अपनी