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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 878 में से

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पृष्ठ 514
  • अध्याय २५२ * ४८७

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दो सौ बावनवाँ अध्याय तलवारके बत्तीस हाथ, पाश, चक्र, शूल, तोमर, गदा, परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, वज्र, कृपाण, क्षेपणी, गदायुद्ध तथा मल्लयुद्धके दाँव और पैंतरोंका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं-ब्रह्मन् ! भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, प्लुत (या सृत), सम्पात, समुदीर्ण, श्येनपात, आकुल, उद्धूत, अवधूत, सव्य, दक्षिण, अनालक्षित, विस्फोट, करालेन्द्र, महासख, विकराल, निपात, विभीषण, भयानक, समग्र, अर्ध, तृतीयांश, पाद, पादार्ध, वारिज, प्रत्यालीढ, आलीढ, वराह और लुलित-ये रणभूमिमें दिखाये जानेवाले ढाल-तलवारके बत्तीस हाथ (या चलानेके ढंग) हैं; इन्हें जानना चाहिये ॥ १-४॥

परावृत्त, अपावृत्त, गृहीत, लघु, ऊर्ध्वक्षिप्त, अधःक्षिप्त, संधारित, विधारित, श्येनपात, गजपात और ग्राह-ग्राह्य-ये युद्धमें 'पाश' फेंकनेके ग्यारह प्रकार हैं ॥ ५-६॥

ऋजु, आयत, विशाल, तिर्यक् और भ्रामित-ये पाँच कर्म 'व्यस्तपाश' के लिये महात्माओंने बताये हैं ॥ ७ ॥

छेदन, भेदन, पात, भ्रमण, शमन, विकर्तन तथा कर्तन-ये सात कर्म 'चक्र'के हैं ॥ ८ ॥

आस्फोट, क्ष्वेडन, भेद, त्रास, आन्दोलितक और आघात-ये छः 'शूल'के कर्म जानो ॥ ९॥

द्विजोत्तम! दृष्टिघात, भुजाघात, पार्श्वघात, ऋजुपात, पक्षपात और इषुपात-ये 'तोमर'के कार्य कहे गये हैं ॥ १० ॥

विप्रवर ! आहत, विहत, प्रभूत, कमलासन, ततोर्ध्वगात्र, नमित, वामदक्षिण, आवृत्त, परावृत्त, पादोद्धूत, अवप्लुत, हंसमर्द (या हंसमार्ग) तथा विमर्द-ये 'गदा-सम्बन्धी' कर्म कहे गये हैं ॥ ११-१२ ॥

कराल, अवघात, दंशोपप्लुत, क्षिप्तहस्त, स्थित और शून्य-ये 'फरसे'के कर्म समझने चाहिये ॥ १३ ॥

विप्रवर ! ताड़न, छेदन, चूर्णन, प्लवन तथा घातान-ये 'मुद्गर'के कर्म हैं ॥ १४॥

संभ्रान्त, विश्रान्त, गोविसर्ग तथा सुदुर्धर-ये 'भिन्दिपाल'के कर्म हैं और 'लगुड'के भी वे ही कर्म बताये गये हैं ॥ १५ ॥

द्विजोत्तम ! अन्त्य, मध्य, परावृत्त तथा निदेशान्त-ये 'वज्र' और 'पट्टिश'के कर्म हैं ॥ १६ ॥

हरण, छेदन, घात, भेदन, रक्षण, पातन तथा स्फोटन-ये 'कृपाण'के कर्म कहे गये हैं ॥ १७ ॥

त्रासन, रक्षण, घात, बलोद्धरण और आयत-ये 'क्षेपणी' (गोफन)-के कार्य कहे गये हैं। ये ही 'यन्त्र'के भी कर्म हैं ॥ १८ ॥

संत्याग, अवदंश, वराहोद्धूतक, हस्तावहस्त, आलीन, एकहस्त, अवहस्तक, द्विहस्त, बाहुपाश, कटिरेचितक, उद्गत, उरोघात, ललाटघात, भुजाविधमन, करोद्धूत, विमान, पादाहति, विपादिक, गात्रसंश्लेषण, शान्त, गात्रविपर्यय, ऊर्ध्वप्रहार, घात, गोमूत्र, सव्य, दक्षिण, पारक, तारक, दण्ड (गण्ड), कबरीबन्ध, आकुल, तिर्यग्बन्ध, अपामार्ग, भीमवेग, सुदर्शन, सिंहाक्रान्त, गजाक्रान्त और गर्दभाक्रान्त-ये 'गदायुद्ध'के हाथ जानने चाहिये। अब 'मल्लयुद्ध'के दाव-पेंच बताये जाते हैं ॥ १९-२३$\frac{१}{२}$॥

आकर्षण, विकर्षण, बाहुमूल, ग्रीवाविपरिवर्त, सुदारुण, पृष्ठभङ्ग, पर्यासन, विपर्यास, पशुमार, अजाविक, पादप्रहार, आस्फोट, कटिरेचितक, गात्राश्लेष, स्कन्धगत, महीव्याजन, उरोललाटघात, विस्पष्टकरण, उद्धूत, अवधूत, तिर्यमार्गगत, गजस्कन्ध, अवक्षेप, अपराङ्मुख, देवमार्ग, अधोमार्ग, अमार्गगमनाकुल, यष्टिघात, अवक्षेप, वसुधादारण,