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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 528, कुल 878 में से

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पृष्ठ 528
  • अध्याय २५५ * ५०१

पराजय-लक्षण चतुर्थपादमें पहुँच गया हो, तभी इन दिव्य-प्रमाणोंका आश्रय लेना चाहिये। वादी और प्रतिवादी—दोनोंमेंसे कोई एक परस्पर बातचीत करके, स्वीकृति देकर अपनी रुचिके अनुसार दिव्य-प्रमाणके लिये प्रस्तुत हो और दूसरा सम्भावित शारीरिक या आर्थिक दण्डके लिये तैयार रहे। राजद्रोह या महापातकका संदेह होनेपर शीर्षक स्थितिमें आये बिना भी तुला आदि दिव्य-प्रमाणोंको स्वीकार करे। एक हजार पणसे कमके अभियोगमें अग्नि, विष और तुला—इन दिव्य प्रमाणोंको ग्रहण न करावे; किंतु राजद्रोह और महापातकके अभियोगमें सत्पुरुष सदा इन्हीं प्रमाणोंका वहन करे। सहस्र पणके अभियोगमें तुला आदि तीन दिव्य-प्रमाणोंको प्रस्तुत करे, किंतु अल्प अभियोगमें भी कोश कराये। शपथ ग्रहण करनेवालेके शुद्ध प्रमाणित होनेपर उसे वादीसे पचास पण दिलावे और दोषी प्रमाणित होनेपर उसे दण्ड दे। न्यायाधिकारी दिव्य-प्रमाणके लिये प्रस्तुत मनुष्यको पहले दिन उपवास करवाये तथा दूसरे दिन सूर्योदयके समय वस्त्रसहित स्नान कर लेनेपर बुलाये। फिर राजा और ब्राह्मणोंके सम्मुख उससे सभी दिव्य-प्रमाण ग्रहण करावे। किसी भी जाति अथवा वयकी स्त्री, किसी भी जातिका सोलह वर्षकी अवस्थासे कमका बालक, कम-से-कम अस्सी वर्षकी अवस्थाका बूढ़ा, अन्ध (नेत्रहीन), पङ्गु (पादरहित), जातिमात्रका ब्राह्मण तथा रोगी—इन सबकी शुद्धिके लिये, अर्थात् इनपर लगे हुए अपराधविषयक संदेहका निवारण करनेके लिये 'तुला' नामक दिव्य-प्रमाण ही ग्राह्य है। क्षत्रियके लिये अग्नि (गरम किया हुआ फाल और तपाया हुआ माष), वैश्यके लिये जलमात्र तथा शूद्रके लिये सात जौ विष—इनकी शुद्धिके लिये आवश्यक बताये गये हैं॥ २८—३३॥

तुला-दिव्यप्रमाण

जो तराजू उठाना या तौलना जानते हों, ऐसे लोगोंसे अभियुक्तको तुलाके एक पलड़ेमें बैठाकर दूसरे पलड़ेमें कोई मिट्टी या प्रस्तरका उतने ही वजनका टुकड़ा रखकर उससे उसको ठीक-ठीक तौले। फिर जिस संनिवेशमें वह बराबर तौला गया है, उसमें सफेद खड़ियासे रेखा करके उस व्यक्तिको उतार लिया जाय। उतरनेपर वह निम्नाङ्कित प्रार्थना-वाक्य पढ़कर तुलाको अभिमन्त्रित करे—'सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, आकाश, भूमि, जल, हृदय, यम, दिन, रात्रि, दोनों संध्याकाल और धर्म—ये सब मनुष्यके वृत्तान्तको जानते हैं। तुले! तुम सत्यका धाम (स्थान) हो, पूर्वकालमें देवताओंने तुम्हारा निर्माण किया है। अतः कल्याणि! तुम सत्यको प्रकट करो और मुझे संशयसे मुक्त कर दो। मात:! यदि मैं पापी या अपराधी हूँ तो मेरा पलड़ा नीचे कर दो और यदि मैं दोषरहित हूँ तो मुझे ऊपर उठा दो'॥ ३४—३७॥

अग्नि-दिव्यप्रमाण

अग्निका दिव्य ग्रहण करनेवालेके हाथोंमें धान मसलकर, हाथोंके काले तिल आदि चिह्नोंको देखकर उन्हें महावर आदिसे रँग दे। फिर उसके हाथोंकी अञ्जलिमें पीपलके सात पत्ते रखे। हाथसहित उन पत्तोंको धागेसे आवेष्टित कर दे। इसके बाद दिव्य ग्रहण करनेवाला अग्निकी प्रार्थना करे—'अग्निदेव! आप सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंके अन्तःकरणमें विचरते हैं। आप सबको पवित्र करनेवाले और सब कुछ जाननेवाले हैं। आप साक्षीकी भाँति मेरे पुण्य और पापका निरीक्षण करके सत्यको प्रकट कीजिये'॥ ३८-३९॥

शपथ ग्रहण करनेवालेके ऐसा कहनेपर उसके दोनों हाथोंमें पचास पलका जलता हुआ लौहपिण्ड रख दे। दिव्य ग्रहण करनेवाला मनुष्य उसे लेकर धीरे-धीरे सात मण्डलोंतक चले। मण्डलकी लम्बाई और चौड़ाई सोलह-सोलह अङ्गुलकी हो तथा एक मण्डलसे दूसरे मण्डलकी दूरी भी उतनी ही हो। तदनन्तर शपथ करनेवाला अग्निपिण्डको गिराकर हाथोंमें पुनः धान मसले। यदि हाथ न जले हों तो शपथ करनेवाला मनुष्य शुद्ध माना