अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५१२ * अग्निपुराण *
गया हो तो राजा जीतनेवालेको जीतका धन दिला दे, अन्यथा न दिलाये। द्यूत-व्यवहारको देखनेवाले सभासदके पदपर राजा उन जुआरियोंको ही नियुक्त करे तथा साक्षी भी द्यूतकारोंको ही बनाये। कृत्रिम पाशोंसे छलपूर्वक जूआ खेलनेवाले मनुष्योंके ललाटमें चिह्न करके राजा उन्हें देशसे निर्वासित कर दे। चोरोंको पहचाननेके लिये द्यूतमें एक ही किसीको प्रधान बनाये, यही विधि 'प्राणि-द्यूत-समाह्वय' (घुड़दौड़) आदिमें भी जाननी चाहिये॥ ४९—५३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सीमा-विवादादिके कथनका निर्णय' नामक दो सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५७॥
दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय
व्यवहारके वाक्पारुष्य, दण्डपारुष्य, साहस, विक्रियासम्प्रदान, सम्भूय-समुत्थान, स्तेय, स्त्री-संग्रहण तथा प्रकीर्णक—इन विवादास्पद विषयोंपर विचार
वाक्पारुष्य
[अब 'वाक्पारुष्य' (कठोर गाली देने आदि)-के विषयमें विचार किया जाता है। इसका लक्षण नारदजीने इस प्रकार बताया है—'देश, जाति और कुल आदिको कोसते हुए उनके सम्बन्धमें जो अश्लील और प्रतिकूल अर्थवाली बात कही जाती है, उसको 'वाक्पारुष्य' कहते हैं।' प्रतिकूल अर्थवालीसे तात्पर्य है—उद्वेगजनक वाक्यसे। जैसे कोई कहे—'गौडदेशवाले बड़े झगड़ालू होते हैं' तो यह देशपर आक्षेप हुआ। 'ब्राह्मण बड़े लालची होते हैं'—यह जातिपर आक्षेप हुआ, तथा 'विश्वामित्रगोत्रीय बड़े क्रूर चरित्रवाले होते हैं'—यह कुलपर आक्षेप हुआ। यह 'वाक्पारुष्य' तीन प्रकारका होता है—'निष्ठुर', 'अश्लील' और 'तीव्र'। इनका दण्ड भी उत्तरोत्तर भारी होता है। आक्षेपयुक्त वचनको 'निष्ठुर' कहते हैं, जिसमें अभद्र बात कही जाय, वह 'अश्लील' है और जिससे किसीपर पातकी होनेका आरोप हो, वह वाक्य 'तीव्र' है। जैसे किसीने कहा—'तू मूर्ख है, मौगड़ है, तुझे धिक्कार है'—यह साक्षेप वचन 'निष्ठुर'की कोटिमें आता है, किसीकी माँ-बहिनके लिये गाली निकालना 'अश्लील' है और किसीको यह कहना कि 'तू शराबी है, गुरुपत्नीगामी है'—ऐसा कटुवचन 'तीव्र' कहा गया है। इस तरह वाक्पारुष्यके अपराधोंपर दण्डविधान कैसे किया जाता है, इसीका यहाँ विचार है—]
जो न्यूनाङ्ग (लँगड़े-लूले आदि) हैं, न्यूनेन्द्रिय (अन्धे-बहरे आदि) हैं तथा जो रोगी (दूषित चर्मवाले, कोढ़ी आदि) हैं, उनपर सत्यवचन, असत्यवचन अथवा अन्यथा-स्तुतिके द्वारा कोई आक्षेप करे तो राजा उसपर साढ़े बारह पण दण्ड लगाये। (''इन महोदयकी दोनों आँखें नहीं हैं, इसलिये लोग इन्हें 'अंधा' कहते हैं''—यह सत्यवचनद्वारा आक्षेप हुआ। ''इनकी आँखें तो सही-सलामत हैं, फिर भी लोग इन्हें 'अंधा' कहते हैं''—यह असत्यवचनद्वारा आक्षेप हुआ। 'तुम विकृताकार होनेसे ही दर्शनीय हो गये हो' यह 'अन्यथास्तुति' है।)॥ १॥
जो मनुष्य किसीपर आक्षेप करते हुए इस प्रकार कहे कि 'मैं तेरी बहिनसे, तेरी माँसे समागम करूँगा' तो राजा उसपर पचीस पणका अर्थदण्ड लगाये। यदि गाली देनेवालेकी अपेक्षा गाली पानेवाला अधम* है तो उसको गाली
* गुण और आचरणकी दृष्टिसे गिरा हुआ।