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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 543, कुल 878 में से

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पृष्ठ 543

५१६ * अग्निपुराण *


अर्थदण्डके योग्य होता है*। तोलनदण्ड, शासन, मान (प्रस्थ, द्रोण आदि) तथा नाणक (मुद्रा आदिसे चिह्नित निष्क आदि)—इनमें जो कूटकारी (मानके वजनमें कमी-बेशी तथा सुवर्णमें ताँबे आदिकी मिलावट करनेवाला) हो तथा उससे कूट-तुला आदि व्यवहार करता हो, उन दोनोंको पृथक्-पृथक् उत्तम साहसके दण्डसे दण्डित करना चाहिये। सिक्कोंकी परीक्षा करते समय यदि पारखी असली सिक्केको नकली या नकली सिक्केको असली बतावे तो राजा उससे भी प्रथम साहसका दण्ड वसूल करे। जो वैद्य आयुर्वेदको न जाननेपर भी पशुओं, मनुष्यों और राजकर्मचारियोंकी मिथ्या चिकित्सा करे, उसे क्रमशः प्रथम, मध्यम और उत्तम साहसके दण्डसे दण्डित करे। जो राजपुरुष कैद न करनेयोग्य (निरपराध) मनुष्योंको राजाकी आज्ञाके बिना कैद करता है और बन्धनके योग्य बन्दीको उसके अभियोगका निर्णय होनेके पहले ही छोड़ देता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यापारी कूटमान अथवा तुलासे धान-कपास आदि पण्यद्रव्यका अष्टमांश हरण करता है, वह दो सौ पणके दण्डसे दण्डनीय होता है। अपहृत द्रव्य यदि अष्टमांशसे अधिक या कम हो तो दण्डमें भी वृद्धि और कमी करनी चाहिये। ओषधि, घृत, तेल, लवण, गन्धद्रव्य, धान्य और गुड़ आदि पण्यवस्तुओंमें जो निस्सार वस्तुका मिश्रण कर देता है, राजा उसपर सोलह पण दण्ड लगावे॥ २९—३९॥

यदि व्यापारीलोग संगठित होकर राजाके द्वारा निश्चित किये हुए भावको जानते हुए भी लोभवश कारु और शिल्पियोंको पीड़ा देनेवाले मूल्यकी वृद्धि या कमी करें तो राजा उनपर एक हजार पणका दण्ड लागू करे। राजा निकटवर्ती हो तो उनके द्वारा जिस वस्तुका जो मूल्य निर्धारित कर दिया गया हो, व्यापारीगण प्रतिदिन उसी भावसे क्रय-विक्रय करें; उसमें जो बचत हो, वही बनियोंके लिये लाभकारक मानी गयी है। व्यापारी देशज वस्तुपर पाँच प्रतिशत लाभ रखे और विदेशी द्रव्यको यदि शीघ्र ही क्रय-विक्रय कर ले तो उसपर दस प्रतिशत लाभ ले। राजा दूकानका खर्च पण्यवस्तुपर रखकर उसका भाव इस प्रकार निश्चित करे, जिससे क्रेता और विक्रेताको लाभ हो॥ ४०—४३॥

विक्रीयासम्प्रदान

(प्रसङ्गप्राप्त ‘साहस’ का प्रकरण समाप्त करके अब ‘विक्रीयासम्प्रदान’ आरम्भ करते हैं। नारदजीके वचनानुसार ‘विक्रीयासम्प्रदान’ का स्वरूप इस प्रकार है—‘‘मूल्य लेकर पण्यवस्तुका विक्रय करके जब खरीदारको वह वस्तु नहीं दी जाती है, तब वह ‘विक्रीयासम्प्रदान’ (बेचकर भी वस्तुको न देना) नामक विवादास्पद कहलाता है।’’ विक्रेय वस्तु ‘चल’ और ‘अचल’के भेदसे दो प्रकारकी होती है। फिर उसके छः भेद किये गये हैं—गणित, तुलित, मेय, क्रियोपलक्षित, रूपोपलक्षित और दीप्तिसे उपलक्षित। सुपारीके फल आदि ‘गणित’ हैं; क्योंकि वे गिनकर बेचे जाते हैं। सोना, कस्तूरी और केसर आदि ‘तुलित’ हैं; क्योंकि वे तौलकर बेचे जाते हैं। शाली (अगहनी धान) आदि ‘मेय’ हैं; क्योंकि वे पात्रविशेषसे माप कर दिये जाते हैं। ‘क्रियोपलक्षित’ वस्तुमें घोड़े, भैंस आदिकी गणना है; क्योंकि उनकी चाल और दोहन आदिकी क्रियाको दृष्टिमें रखकर ही उनका क्रय-विक्रय होता है। ‘रूपोपलक्षित’ वस्तुमें पण्यस्त्री (वेश्या) आदिकी गणना है; क्योंकि उनके रूपके अनुसार ही उनका मूल्य होता है। ‘दीप्तिसे उपलक्षित’ वस्तुओंमें हीरा, मोती, मरकत और पद्मराग आदिकी गणना है। इन छहों प्रकारकी पण्यवस्तुको बेचकर, मूल्य लेकर भी यदि क्रेताको वह वस्तु नहीं दी जाती