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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 568, कुल 878 में से

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पृष्ठ 568

* अध्याय २६७ * ५४१


दो सौ सरसठवाँ अध्याय

माहेश्वर-स्नान आदि विविध स्नानोंका वर्णन; भगवान् विष्णुके पूजनसे तथा गायत्रीमन्त्रद्वारा लक्ष-होमादिसे शान्तिकी प्राप्तिका कथन

पुष्कर कहते हैं— अब मैं राजा आदिकी विजयश्रीको बढ़ानेवाले 'माहेश्वर-स्नान'का वर्णन करता हूँ, जिसका पूर्वकालमें शुक्राचार्यने दानवेन्द्र बलिको उपदेश किया था। प्रातःकाल सूर्योदयके पूर्व भद्रपीठपर आचार्य जलपूर्ण कलशोंसे राजाको स्नान करावे॥ १ $\frac{१}{२}$ ॥

(स्नानके समय निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ करे)
'ॐ नमो भगवते रुद्राय च बलाय च पाण्डरोचितभस्मानुलिप्तगात्राय (तद्यथा*) जय-जय सर्वान् शत्रून् मूकयस्व कलहविग्रहविवादेषु भञ्जय भञ्जय। ॐ मथ मथ। सर्वप्रत्यर्थिकान् योऽसौ युगान्तकाले दिधक्षति। इमां पूजां रौद्रमूर्तिः सहस्रांशुः शुक्लः स ते रक्षतु जीवितम्। संवर्तकाग्नितुल्यश्च त्रिपुरान्तकरः शिवः। सर्वदेवमयः सोऽपि तव रक्षतु जीवितम्॥ लिखि लिखि ख्विलि स्वाहा।'

'धवल भस्मका अनुलेपन अपने अङ्गोंमें लगाये महाबलशाली भगवान् रुद्रको नमस्कार है। आपकी जय हो, जय हो। समस्त शत्रुओंको गूँगा कर दीजिये। कलह, युद्ध एवं विवादमें भग्न कीजिये, भग्न कीजिये। मथ डालिये, मथ डालिये। जो प्रलयकालमें सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर देना चाहते हैं, वे रुद्र समस्त प्रतिपक्षियोंको भस्म कर डालें। इस पूजाको स्वीकार करके वे रौद्रमूर्ति, सहस्र किरणोंसे सुशोभित, शुक्लवर्ण शिव तुम्हारे जीवनकी रक्षा करें। प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी, सर्वदेवमय, त्रिपुरनाशक शिव तुम्हारे जीवनकी रक्षा करें।' इस प्रकार मन्त्रसे स्नान करके तिल एवं तण्डुलका होम करे। फिर त्रिशूलधारी भगवान् शिवको पञ्चामृतसे स्नान कराके उनका पूजन करे॥ २—६ $\frac{१}{२}$ ॥

अब मैं तुम्हारे सम्मुख सदा विजयकी प्राप्ति करानेवाले अन्य स्नानोंका वर्णन करता हूँ। घृत-स्नान आयुकी वृद्धि करनेमें उत्तम है। गोमयसे स्नान करनेपर लक्ष्मीप्राप्ति, गोमूत्रसे स्नान करनेपर पाप-नाश, दुग्धसे स्नान करनेपर बलवृद्धि एवं दधिसे स्नान करनेपर सम्पत्तिकी वृद्धि होती है। कुशोदकसे स्नान करनेपर पापनाश, पञ्चगव्यसे स्नान करनेपर समस्त अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति, शतमूलसे स्नान करनेपर सभी कामनाओंकी सिद्धि तथा गोशृङ्गके जलसे स्नान करनेपर पापोंकी शान्ति होती है। पलाश, बिल्वपत्र, कमल एवं कुशके जलसे स्नान करना सर्वप्रद है। बचा, दो प्रकारकी हल्दी और मोथामिश्रित जलसे किया गया स्नान राक्षसोंके विनाशके लिये उत्तम है। इतना ही नहीं, वह आयु, यश, धर्म और मेधाकी भी वृद्धि करनेवाला है। स्वर्णजलसे किया गया स्नान मङ्गलकारी होता है। रजत और ताम्रजलसे किये गये स्नानका भी यही फल है। रत्नमिश्रित जलसे स्नान करनेपर विजय, सब प्रकारके गन्धोंसे मिश्रित जलद्वारा स्नान करनेपर सौभाग्य, फलोदकसे स्नान करनेपर आरोग्य तथा धात्रीफलके जलसे स्नान करनेपर उत्तम लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। तिल एवं श्वेत सर्षपके जलसे स्नान करनेपर लक्ष्मी, प्रियंगुजलसे स्नान करनेपर सौभाग्य, पद्म, उत्पल तथा कदम्बमिश्रित जलसे स्नान करनेपर लक्ष्मी एवं बला-वृक्षके जलसे स्नान करनेपर बलकी प्राप्ति होती है। भगवान् श्रीविष्णुके चरणोदकद्वारा


* यद्यपि 'तद्यथा' यह पाठ अग्निपुराणकी सभी प्रतियोंमें उपलब्ध होता है, परंतु यह अधिक प्रतीत होता है।