अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें३० *** अग्निपुराण ***
हुआ। हे मुने! कुमार ध्रुवने सुन्दर कीर्ति बढ़ानेके लिये तीन* हजार दिव्य वर्षोंतक तप किया। उसपर प्रसन्न होकर भगवान् विष्णुने उसे सप्तर्षियोंके आगे स्थिर स्थान (ध्रुवपद) दिया। ध्रुवके इस अभ्युदयको देखकर शुक्राचार्यने उनके सुयशका सूचक यह श्लोक पढ़ा—'अहो! इस ध्रुवकी तपस्याका कितना प्रभाव है, इसका शास्त्र-ज्ञान कितना अद्भुत है, जिसे आज सप्तर्षि भी आगे करके स्थित हैं।' उस ध्रुवसे उनकी पत्नी शम्भुने श्लिष्टि और भव्य नामक पुत्र उत्पन्न किये। श्लिष्टिसे उसकी पत्नी सुच्छायाने क्रमशः रिपु, रिपुंजय, पुष्य, वृकल और वृकतेजा—इन पाँच निष्पाप पुत्रोंको अपने गर्भमें धारण किया। रिपुके वीर्यसे बृहतीने चाक्षुष और सर्वतेजाको अपने गर्भमें स्थान दिया॥ १—७॥
चाक्षुषने वीरण प्रजापतिकी कन्या पुष्करिणीके गर्भसे मनुको जन्म दिया। मनुसे नड्वलाके गर्भसे दस उत्तम पुत्र उत्पन्न हुए। [उनके नाम ये हैं—] ऊरु, पूरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक्, कवि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुद्युम्न और अभिमन्यु। ऊरुके अंशसे आग्नेयीने अङ्ग, सुमना, स्वाति, क्रतु, अङ्गिरा और गय नामक महान् तेजस्वी छः पुत्र उत्पन्न किये। अङ्गसे सुनीथाने एक ही संतान वेनको जन्म दिया। वह प्रजाओंकी रक्षा न करके सदा पापमें ही लगा रहता था। उसे मुनियोंने कुशोंसे मार डाला। तदनन्तर ऋषियोंने संतानके लिये वेनके दायें हाथका मन्थन किया। हाथका मन्थन होनेपर राजा पृथु प्रकट हुए। उन्हें देखकर मुनियोंने कहा—'ये महान् तेजस्वी राजा अवश्य ही समस्त प्रजाको आनन्दित करेंगे तथा महान् यश प्राप्त करेंगे।' क्षत्रियवंशके पूर्वज वेन-कुमार राजा पृथु अपने तेजसे सबको दग्ध करते हुए-से धनुष और कवच धारण किये हुए ही प्रकट हुए थे; वे सम्पूर्ण प्रजाकी रक्षा करने लगे॥ ८—१४॥
राजसूय-यज्ञमें दीक्षित होनेवाले नरेशोंमें वे सबसे पहले भूपाल थे। उनसे दो पुत्र उत्पन्न हुए। स्तुतिकर्ममें निपुण अद्भुतकर्मा सूत और मागधोंने उनका स्तवन किया। वे प्रजाओंका रञ्जन करनेके कारण 'राजा' नामसे विख्यात हुए। उन्होंने प्रजाओंकी जीवन-रक्षाके निमित्त अन्नकी उपज बढ़ानेके लिये गोरूपधारिणी पृथ्वीका दोहन किया। उस समय एक साथ ही देवता, मुनिवृन्द, गन्धर्व, अप्सरागण, पितर, दानव, सर्प, लता, पर्वत और मनुष्यों आदिके द्वारा अपने-अपने विभिन्न पात्रोंमें दुही जानेवाली पृथिवीने सबको इच्छानुसार दूध दिया, जिससे सबने प्राण धारण किये। पृथुके जो दो धर्मज्ञ पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम थे अन्तर्धि और पालित। अन्तर्धान (अन्तर्धि)-के अंशसे उनकी शिखण्डिनी नामवाली पत्नीने 'हविर्धान' को जन्म दिया। अग्निकुमारी धिषणाने हविर्धानके अंशसे छः पुत्रोंको उत्पन्न किया। उनके नाम ये हैं—प्राचीनबर्हिष्, शुक्र, गय, कृष्ण, व्रज और अजिन। राजा प्राचीनबर्हिष् प्रायः यज्ञमें ही लगे रहते थे, जिससे उस समय पृथिवीपर दूर-दूरतक पूर्वाग्र कुश फैल गये थे। इससे वे ऐश्वर्यशाली राजा 'प्राचीनबर्हिष्' नामसे विख्यात हुए। वे एक महान् प्रजापति थे॥ १५—२१॥
प्राचीनबर्हिष्से उनकी पत्नी समुद्र-कन्या सवर्णानि दस पुत्रोंको अपने गर्भमें धारण किया। वे सभी 'प्रचेता'नामसे प्रसिद्ध हुए और सब-के-सब धनुर्वेदमें पारंगत थे। वे एक समान धर्मका आचरण करते हुए समुद्रके जलमें रहकर दस
* श्रीमद्भागवतके वर्णनानुसार ध्रुव केवल छः मास तपस्या करके सिद्धिके भागी हुए थे। इस अग्निपुराणमें तपस्याकाल बहुत अधिक कहा गया है। कल्पभेदसे दोनों ही वर्णन संगत हो सकते हैं।