अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 571, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें५४४ * अग्निपुराण *
दिन वाहनोंको विशेषरूपसे अलंकृत करना चाहिये। राजचिह्नोंकी पूजा करके उन्हें उनके अधिकृत पुरुषोंके हाथोंमें दे। धर्मज्ञ परशुराम ! फिर कालज्ञ ज्योतिषी हाथी, अश्व, छत्र, खड्ग, धनुष, दुन्दुभि, ध्वजा एवं पताका आदि राजचिह्नोंको अभिमन्त्रित करे। फिर उन सबको अभिमन्त्रित करके हाथीकी पीठपर रखे। ज्योतिषी और पुरोहित भी हाथीपर आरूढ़ हों। इस प्रकार अभिमन्त्रित वाहनोंपर आरूढ़ होकर तोरण-द्वारसे निष्क्रमण करें। इस प्रकार राजद्वारसे बाहर निकलकर राजा हाथीकी पीठपर स्थित रहकर विधिपूर्वक बलि-वितरण करे। फिर नरेश सुस्थिरचित्त होकर चतुरङ्गिणी सेनाके साथ सर्वसैन्यसमूहके द्वारा जयघोष कराते हुए दिग्दिगन्तको प्रकाशित करनेवाले जलते मसालोंके समूहकी तीन बार परिक्रमा करे। इस प्रकार पूजन करके राजा जनसाधारणको विदा करके राजभवनको प्रस्थान करे। मैंने यह समस्त शत्रुओंका विनाश करनेवाली 'नीराजना' नामक शान्ति बतलायी है, जो राजाको अभ्युदय प्रदान करनेवाली है॥ १६-३१॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नीराजनाविधिका वर्णन' नामक दो सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६८॥
दो सौ उनहत्तरवाँ अध्याय
छत्र, अश्व, ध्वजा, गज, पताका, खड्ग, कवच और दुन्दुभिकी प्रार्थनाके मन्त्र
पुष्कर कहते हैं—परशुराम ! अब मैं छत्र आदि राजोपकरणोंके प्रार्थना मन्त्र बतलाता हूँ, जिनसे उनकी पूजा करके नरेशगण विजय आदि प्राप्त करते हैं॥ $\frac{१}{२}$॥
छत्र-प्रार्थना-मन्त्र
'महामते छत्रदेव ! तुम हिम, कुन्द एवं चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिसे सुशोभित और पाण्डुर-वर्णकी-सी आभावाले हो। ब्रह्माजीके सत्यवचन तथा चन्द्र, वरुण और सूर्यके प्रभावसे तुम सतत वृद्धिशील होओ। जिस प्रकार मेघ मङ्गलके लिये इस पृथ्वीको आच्छादित करता है, उसी प्रकार तुम विजय एवं आरोग्यकी वृद्धिके लिये राजाको आच्छादित करो'॥ १-३॥
अश्व-प्रार्थना-मन्त्र
'अश्व ! तुम गन्धर्वकुलमें उत्पन्न हुए हो, अतः अपने कुलको दूषित करनेवाला न होना। ब्रह्माजीके सत्यवचनसे तथा सोम, वरुण एवं अग्निदेवके प्रभावसे, सूर्यके तेजसे, मुनिवरोंके तपसे, रुद्रके ब्रह्मचर्यसे और वायुके बलसे तुम सदा आगे बढ़ते रहो। याद रखो, तुम अश्वराज उच्चैःश्रवाके पुत्र हो; अपने साथ ही प्रकट हुए कौस्तुभरत्नका स्मरण करो। (तुम्हें भी उसीकी भाँति अपने यशसे प्रकाशित होते रहना चाहिये।) ब्रह्मघाती, पितृघाती, मातृहन्ता, भूमिके लिये मिथ्याभाषण करनेवाला तथा युद्धसे पराङ्मुख क्षत्रिय जितनी शीघ्रतासे अधोगतिको प्राप्त होता है, तुम भी युद्धसे पीठ दिखानेपर उसी दुर्गति को प्राप्त हो सकते हो; किंतु तुम्हें वैसा पाप या कलङ्क न लगे। तुरंगम ! तुम युद्धके पथपर विकारको न प्राप्त होना। समराङ्गणमें शत्रुओंका विनाश करते हुए अपने स्वामीके साथ तुम सुखी होओ'॥ ४-८ $\frac{१}{२}$॥
ध्वजा-प्रार्थना-मन्त्र
'महापराक्रमके प्रतीक इन्द्रध्वज ! भगवान् नारायणके ध्वज विनतानन्दन पक्षिराज गरुड तुममें प्रतिष्ठित हैं। वे सर्पशत्रु, विष्णुवाहन, कश्यपनन्दन