अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २७१ * ५४७
और तेजका नाश करते हैं तथा जो मेरी कान्ति या तेजको विलुप्त करनेवाले हैं, जो उपभोग-सामग्रीको हर लेनेवाले तथा शुभ लक्षणोंका नाश करनेवाले हैं, वे कूष्माण्डगण श्रीविष्णुके सुदर्शन-चक्रके वेगसे आहत होकर विनष्ट हो जायँ। देवाधिदेव भगवान् वासुदेवके संकीर्तनसे मेरी बुद्धि, मन और इन्द्रियोंको स्वास्थ्यलाभ हो। मेरे आगे-पीछे, दायें-बायें तथा कोणवर्तिनी दिशाओंमें सब जगह जनार्दन श्रीहरिका निवास हो। सबके पूजनीय, मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले अनन्तरूप परमेश्वर जनार्दनके चरणोंमें प्रणत होनेवाला कभी दुखी नहीं होता। जैसे भगवान् श्रीहरि परब्रह्म हैं, उसी प्रकार वे परमात्मा केशव भी जगत्स्वरूप हैं—इस सत्यके प्रभावसे तथा भगवान् अच्युतके नामकीर्तनसे मेरे त्रिविध पापोंका नाश हो जाय'*॥ ९–१५॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'विष्णुपञ्जरस्तोत्रका कथन' नामक दो सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २७०॥
दो सौ एकहत्तरवाँ अध्याय वेदोंके मन्त्र और शाखा आदिका वर्णन तथा वेदोंकी महिमा
पुष्कर कहते हैं— परशुराम! वेदमन्त्र सम्पूर्ण विश्वपर अनुग्रह करनेवाले तथा चारों पुरुषार्थोंके साधक हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद—ये चार वेद हैं। इनके मन्त्रोंकी संख्या एक लाख है। ऋग्वेदकी एक शाखा 'सांख्सायन' और दूसरी शाखा 'आश्वलायन' है। इन दो शाखाओंमें एक सहस्र तथा ऋग्वेदीय ब्राह्मणभागमें दो सहस्र मन्त्र हैं। श्रीकृष्णद्वैपायन आदि महर्षियोंने ऋग्वेदको प्रमाण माना है। यजुर्वेदमें उन्नीस सौ मन्त्र हैं। उसके ब्राह्मण-ग्रन्थोंमें एक हजार मन्त्र
* श्रीविष्णुपञ्जरस्तोत्र पुष्कर उवाच— त्रिपुरं जघ्नुषः पूर्वं ब्रह्मणा विष्णुपञ्जरम्। शंकरस्य द्विजश्रेष्ठ रक्षणाय निरूपितम्॥ वागीशेन च शक्रस्य बलं हन्तुं प्रयासतः। तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि तत् त्वं शृणु जयादिमत्॥ विष्णुः प्राच्यां स्थितश्चक्री हरिर्दक्षिणतो गदी। प्रतीच्यां शार्ङ्गधृग् विष्णुर्जिष्णुः खड्गी ममोत्तरे॥ हृषीकेशो विकोणेषु तच्छिद्रेषु जनार्दनः। क्रोडरूपी हरिर्भूभौ नरसिंहोऽम्बरे मम॥ क्षुरान्तममलं चक्रं भ्रमत्येतत् सुदर्शनम्। अस्यांशुमाला दुष्प्रेक्ष्या हन्तुं प्रेतनिशाचरान्॥ गदा चेयं सहस्रार्चिः प्रदीप्तपावकोज्ज्वला। रक्षोभूतपिशाचानां डाकिनीनां च नाशनी॥ शार्ङ्गविस्फूर्जितं चैव वासुदेवस्य मद्रिपून्। तिर्यङ्मनुष्यकूष्माण्डप्रेतादीन् हन्त्वशेषतः॥ खड्गधारोज्ज्वलज्योत्स्नानिर्दूता ये समाहिताः। ते यान्तु शाम्यतां सद्यो गरुडेनेव पन्नगाः॥ ये कूष्माण्डास्तथा यक्षा ये दैत्या ये निशाचराः। प्रेता विनायकाः क्रूरा मनुष्या जम्भगाः खगाः॥ सिंहादयश्च पशवो दंदशूकाश्च पन्नगाः। सर्वे भवन्तु ते सौम्याः कृष्णशङ्खरवाहताः॥ चित्तवृत्तिहरा ये मे ये जनाः स्मृतिहारकाः। बलौजसां च हर्तारश्छायाविभ्रंशकाश्च ये॥ ये चोपभोगहर्तारो ये च लक्षणनाशकाः। कूष्माण्डास्ते प्रणश्यन्तु विष्णुचक्रप्रवाहताः॥ बुद्धिस्वास्थ्यं मनःस्वास्थ्यं स्वास्थ्यमैन्द्रियकं तथा। ममास्तु देवदेवस्य वासुदेवस्य कीर्तनात्॥ पृष्ठे पुरस्तान्मम दक्षिणेत्तरे विकोणतश्चास्तु जनार्दनो हरिः। तमीड्यमीशानमनन्तमच्युतं जनार्दनं प्रणिपतितो न सीदति॥ यथा परं ब्रह्म हरिरस्तथा परो जगत्स्वरूपश्च स एव केशवः। सत्येन तेनाच्युतनामकीर्तनात् प्रणाश्येतु त्रिविधं ममाशुभम्॥ (अग्निपु० २७०। १–१५)