अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 616, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २९१ * ५८९
सिवा कमलके दस दलोंपर दस दिक्पालोंकी भी पूजा करे। प्रत्येक अर्चनीय देवताके निमित्त वेदीपर जलपूर्ण कलश स्थापित करे और उन कलशोंमें अधिष्ठित देवोंकी पूजा करे। इन देवताओंके उत्तरभागमें इन सबके निमित्त तिल, अक्षत, घी और पीली सरसोंकी आहुतियाँ दे। एक-एक देवताके निमित्त सौ-सौ आहुतियाँ देनी चाहिये। अश्वसम्बन्धी रोगोंके निवारणके लिये उपवासपूर्वक यह शान्तिकर्म करना उचित है॥ ६-८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अश्व-शान्तिका कथन' नामक दो सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९०॥
दो सौ इक्यान्बेवाँ अध्याय
गज-शान्ति
शालिहोत्र कहते हैं—मैं गजरोगोंका प्रशमन करनेवाली गज-शान्तिके विषयमें कहूँगा। किसी भी शुक्ला पञ्चमीको विष्णु, लक्ष्मी तथा नागराज ऐरावतकी पूजा करे। फिर ब्रह्मा, शिव, विष्णु, इन्द्र, कुबेर, यमराज, चन्द्रमा, सूर्य, वरुण, वायु, अग्नि, पृथिवी, आकाश, शेषनाग, पर्वत, विरूपाक्ष, महापद्म, भद्र, सुमनस और देवजातीय आठ हाथियोंका पूजन करे। उन आठ नागोंके नाम ये हैं—कुमुद, ऐरावत, पद्म, पुष्पदन्त, वामन, सुप्रतीक, अञ्जन और नील। तत्पश्चात् होम करे और दक्षिणा दे। शान्ति-कलशके जलसे हाथियोंका अभिषेक किया जाय तो वे वृद्धिको प्राप्त होते हैं। (यह नित्य विधि है) अब नैमित्तिक शान्तिकर्मके विषयमें सुनो॥ १-४$\frac{१}{२}$॥
मकर आदिकी संक्रान्तियोंमें हाथियोंका नगरके बहिर्भागमें ईशानकोणमें (पूजन करे)। वेदी या पद्मासनपर अष्टदल कमलका निर्माण करके उसमें केसरके स्थानपर श्रीविष्णु और लक्ष्मीकी अर्चना करे। तदनन्तर अष्टदलोंमें क्रमशः ब्रह्मा, सूर्य, पृथ्वी, स्कन्द, अनन्त, आकाश, शिव तथा चन्द्रमाकी पूजा करे। उन्हीं आठ दलोंमें पूर्वाधिके क्रमसे इन्द्रादि दिक्पालोंका भी पूजन करे। देवताओंके साथ कमलदलोंमें उनके वज्र, शक्ति, दण्ड, तोमर, पाश, गदा, शूल और पद्म आदि अस्त्रोंकी अर्चना करनी चाहिये। दलोंके बाह्यभागमें चक्रमें सूर्य और अश्विनीकुमारोंकी पूजा करे। अष्टवसुओं एवं साध्यदेवोंका दक्षिणभागमें तथा भार्गवाङ्गिरस देवताओंका नैर्ऋत्यकोणमें यजन करे। वायव्यकोणमें मरुद्गणोंका, दक्षिणभागमें विश्वेदेवोंका एवं रौद्रमण्डल (ईशान)-में रुद्रोंका पूजन करना चाहिये। वृत्तरेखाके द्वारा निर्मित अष्टदल कमलके बहिर्भागमें सरस्वती, सूत्रकार और देवर्षियोंकी अर्चना करे। पूर्वभागमें नदी, पर्वतों एवं ईशान आदि कोणोंमें महाभूतोंकी पूजा करे। तदनन्तर पद्म, चक्र, गदा तथा शङ्खसे सुशोभित चतुष्कोण एवं चतुर्द्वारयुक्त भूपुरमण्डलका निर्माण करके आग्नेय आदि कोणोंमें कलशोंकी भी स्थापना करे तथा चारों ओर पताकाओं और तोरणोंका निवेश करे। सभी द्वारोंपर ऐरावत आदि नागराजोंका पूजन करे। पूर्वादि दिशाओंमें समस्त देवताओंके लिये पृथक्-पृथक् सर्वौषधियुक्त पात्र रखे। हाथियोंका पूजन करके उनकी परिक्रमा करे। सभी देवताओंके उद्देश्यसे पृथक्-पृथक् सौ-सौ आहुतियाँ प्रदान करे। तदनन्तर नागराज, अग्नि और देवताओंको साथ लेकर बाजे बजाते हुए अपने घरोंको लौटना चाहिये। ब्राह्मणों एवं