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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 633, कुल 878 में से

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पृष्ठ 633

६०६ * अग्निपुराण *


पूर्वोक्त 'नीलकण्ठ-मन्त्र' जोड़ दे। इस प्रकार बताये गये मन्त्रका वक्षःस्थल, कण्ठ और शिखामें न्यास करे। उक्त दोनों मन्त्रोंका संस्कार करके उन्हें स्तम्भमें अङ्कित करे॥ २८॥

इसके पश्चात् निम्नाङ्कित रूपसे न्यास करे— 'हर हर स्वाहा हृदयाय नमः। कपर्दिने स्वाहा शिरसे स्वाहा। नीलकण्ठाय स्वाहा शिखायै वषट्। कालकूटविषभक्षणाय हुं फट् कवचाय हुम्।' इससे भुजाओं तथा कण्ठका स्पर्श करे। 'कृत्तिवाससे नेत्रत्रयाय वौषट् नीलकण्ठाय स्वाहा अस्त्राय फट्*'॥ २९॥

जिनके पूर्व आदि मुख क्रमशः श्वेत, पीत, अरुण और श्याम हैं, जो अपने चारों हाथोंमें क्रमशः अभय, वरद, धनुष तथा वासुकि नागको धारण करते हैं, जिनके गलेमें यज्ञोपवीत शोभा पाता है और पार्श्वभागमें गौरीदेवी विराजमान हैं, वे भगवान् रुद्र इस मन्त्रके देवता हैं। दोनों पैर, दोनों घुटने, गुह्यभाग, नाभि, हृदय, कण्ठ और मस्तक—इन अङ्गोंमें मन्त्रके अक्षरोंका न्यास करके दोनों हाथोंमें अङ्गुष्ठ आदि अँगुलियोंमें अर्थात् तर्जनीसे लेकर तर्जनीपर्यन्त अँगुलियोंमें मन्त्राक्षरोंका न्यास करके सम्पूर्ण मन्त्रका अङ्गुष्ठोंमें न्यास करे॥ ३०—३२$\frac{१}{२}$॥

इस प्रकार ध्यान और न्यास करके शीघ्र ही बँधी हुई शूलमुद्राद्वारा विषका संहार करे। कनिष्ठा अँगुली ज्येष्ठासे बँध जाय और तीन अन्य अँगुलियाँ फैल जायँ तो 'शूलमुद्रा' होती है। विषका नाश करनेके लिये बायें हाथका और अन्य कार्यमें दक्षिण हाथका प्रयोग करना चाहिये॥ ३३-३४॥

ॐ नमो भगवते नीलकण्ठाय चिः। अमलकण्ठाय चिः। सर्वज्ञकण्ठाय चिः। क्षिप क्षिप ॐ स्वाहा। अमलनीलकण्ठाय नैकसर्पविषापहाय। नमस्ते रुद्र मन्यवे।

—इस मन्त्रको पढ़कर झाड़नेसे विष नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। रोगीके कानमें जप करनेसे अथवा मन्त्र पढ़ते हुए जूतेसे रोगीके पासकी भूमिपर पीटनेसे विष उतर जाता है। रुद्रविधान करके उसके द्वारा नीलकण्ठ महेश्वरका यजन करे। इससे विष-व्याधिका विनाश हो जाता है॥ ३५-३६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'दष्ट-चिकित्साका कथन' नामक दो सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९५॥


दो सौ छियानबेवाँ अध्याय

पञ्चाङ्ग-रुद्रविधान

**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं 'पञ्चाङ्ग-रुद्र-विधान'का वर्णन करता हूँ। यह परम उत्तम तथा सब कुछ प्रदान करनेवाला है। 'शिवसंकल्प' इसका हृदय, 'पुरुषसूक्त' शीर्ष, 'अद्भ्यः सम्भूतः०' (यजु० ३१।१७) आदि सूक्त शिखा और 'आशुः शिशानः' आदि अध्याय इसका कवच है। शतरुद्रिय-संज्ञक रुद्रके ये पाँच अङ्ग हैं। रुद्रदेवका ध्यान करके इसके पञ्चाङ्गभूत रुद्रोंका क्रमशः जप करे। 'यज्जाग्रतो०' आदि छः ऋचाओंका शिवसंकल्प-सूक्त (यजु० ३४।१—६) इसका हृदय है। इसके शिवसंकल्प ऋषि और त्रिष्टुप् छन्द कहे गये हैं। 'सहस्रशीर्षा०' (यजु० ३१)-से प्रारम्भ होनेवाला पुरुषसूक्त इसका शीर्षस्थानीय है। इसके नारायण ऋषि,


* यह अङ्गन्यास 'शारदातिलक' और 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'में इसी प्रकार उपलब्ध है।

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