अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 635, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें६०८ * अग्निपुराण *
कम्पय जल्पय जल्पय सर्पदष्टमुत्थापयोत्थापय लल लल बन्ध बन्ध मोचय मोचय वररुद्र गच्छ गच्छ वध वध त्रुट त्रुट वुक वुक भीषय भीषय मुष्टिना विषं संहर संहर ठ ठ।'—इस ‘पक्षिरुद्र-मन्त्र’से सर्पदष्ट मनुष्यको अभिमन्त्रित करनेपर उसके विषका नाश हो जाता है। ॐ नमो भगवते रुद्र नाशय विषं स्थावरजङ्गमं कृत्रिमाकृत्रिमं विषमपविषं नाशय नानाविषं दष्टकविषं नाशय धम धम दम दम वम वम मेघान्धकारधारावर्षकर्ष निर्विषीभव संहर संहर गच्छ गच्छ आवेशय आवेशय विषोत्थापनरूपं मन्त्राद् विषधारणम् 'ॐ क्षिप ॐ क्षिप स्वाहा' 'ॐ ह्रां ह्रीं ख्रीं सः ठं द्रौं ह्रीं ठः ।'—यह मन्त्र जप आदिके द्वारा सिद्ध होनेपर सदैव सर्पोंको बाँध लेता है।
‘गोपीजनवल्लभाय स्वाहा’—यह मन्त्र सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थोंको सिद्ध करनेवाला है। इसमें आदिके एक, दो, तीन और चौथा अक्षर बीजके रूपमें होगा। इससे हृदय, सिर, शिखा और कवचका न्यास होगा। फिर ‘कृष्णचक्राय अस्त्राय फट्’ बोलनेसे पञ्चाङ्गन्यासकी क्रिया पूरी होगी।
‘ॐ नमो भगवते रुद्राय प्रेताधिपतये हुलु हुलु गर्ज गर्ज नागान् भ्रामय भ्रामय मुञ्च मुञ्च मोहय मोहय कट्ट कट्ट आविश आविश सुवर्णपतङ्ग रुद्रो ज्ञापयति स्वाहा ॥ १-५॥
यह ‘पातालक्षोभ-मन्त्र’ है। इसके द्वारा रोगीको अभिमन्त्रित करनेसे यह उसके लिये विषनाशक होता है। दंशक सर्पके डँस लेनेपर जलते काष्ठ, तप्त शिला, आगकी ज्वाला अथवा गरम कोकनद (कमल) आदिके द्वारा दंश-स्थानको जला दे—सेंक दे; इससे विषका उपशमन होता है। शिरीषवृक्षके बीज और पुष्प, आकके दूध और बीज एवं सोंठ, मिर्च तथा पीपल—ये पान, लेपन और अञ्जन आदिके द्वारा विषका नाश करते हैं। शिरीष-पुष्पके रससे भावित सफेद मिर्च पान, नस्य और अञ्जन आदिके द्वारा विषका उपसंहार करती है, इसमें संशय नहीं है। कड़वी तोरई, वच, हींग तथा शिरीष और आकका दूध, त्रिकटु और मेषाम्भ—इनका नस्य आदिके रूपमें प्रयोग होनेपर ये विषका हरण करते हैं। अङ्कोल और कड़वी तुम्बीके सर्वाङ्गके चूर्णसे नस्य लेनेसे विषका अपहरण होता है। इन्द्रायण, चित्तक, द्रोण (गूमा), तुलसी, धतूरा और सहा—इनके रसमें त्रिकटुके चूर्णको भिगोकर खानेसे विषका नाश होता है। कृष्णपक्षकी पञ्चमीको लाया हुआ शिरीषका पञ्चाङ्ग विषहारी है ॥ ६—१२॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘विषहारी मन्त्रौषधका कथन’ नामक दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९७॥
दो सौ अठानबेवाँ अध्याय
गोनसादि-चिकित्सा
**अग्निदेव कहते हैं—**वसिष्ठ! अब मैं तुम्हारे सम्मुख गोनस आदि जातिके सर्पोंके विषकी चिकित्साका वर्णन करता हूँ, ध्यान देकर सुनो। ‘ॐ ह्रां ह्रीं अमलपक्षि स्वाहा’—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित ताम्बूलके प्रयोगसे मन्त्रवेत्ता मण्डली (गोनस) सर्पके विषका हरण करता है। लहसुन, अङ्कोल, त्रिफला, कूट, वच और त्रिकटु—इनका सर्पविषमें पान करे। सर्पविषमें स्नुहीदुग्ध, गोदुग्ध, गोदधि और गोमूत्रमें पकाया हुआ गोघृत पान करना चाहिये। राजिलजातीय सर्पके डँस लेनेपर सैन्धवलवण, पीपल, घृत, मधु, गोमयरस और साहीकी आँतका भक्षण करना