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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 638, कुल 878 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 638

* अध्याय २९९ *
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गुग्गुल, कूट, गजदन्त और घृतसे धूपन और अनुलेपन करे। 'मुक्तकेशी' नामकी ग्रही जन्मके सातवें दिन बालकपर आक्रमण करती है। इससे आक्रान्त बालक दुःखातुर रहता है। उसके शरीरसे सड़नेकी-सी गन्ध आती है। वह जृम्भा, कोलाहल, अत्यधिक रुदन और काससे पीड़ित रहता है। ऐसे बालकको व्याघ्रके नखोंकी धूप देकर बच, गोमय और गोमूत्रसे अनुलिप्त करे। 'श्रीदण्डी' नामवाली ग्रही शिशुको आठवें दिन पकड़ती है। इससे ग्रस्त बालक दिशाओंको देखता, जीभको हिलाता, खाँसता और रोता है। 'श्रीदण्डी'के उद्देश्यसे पूर्वोक्त पदार्थोंकी विविध बलि दे। इससे पीड़ित शिशुको हींग, बच, सफेद सर्षप और लहसुनसे धूपित तथा अनुलिप्त करे। 'ऊर्ध्वग्रही' नवीं महाग्रही है। इससे ग्रस्त बालक उद्वेग और दीर्घ उच्छ्वाससे युक्त होता है। वह अपनी दोनों मुट्ठियोंको चबाता है। ऐसे शिशुको लाल चन्दन, कूट, बच और सरसोंसे लेप और वानरके नख एवं रोमसे धूपन करे। दसवीं 'रोदनी' नामकी ग्रही है। इससे गृहीत शिशुकी निम्नलिखित चेष्टाएँ होती हैं। वह सदा रोता है, उसका शरीर नील वर्ण और सुगन्धसे युक्त हो जाता है। ऐसे शिशुको निम्बका धूप और कूट, बच, राई तथा रालका लेपन करे। 'रोदनी' ग्रहीके उद्देश्यसे लाजा, कुल्माष, वनमूँग और भातकी बलि दे। इस प्रकार ये धूपदान आदिकी क्रियाएँ शिशुके जन्मके तेरहवें दिनतक की जाती हैं। (शेष तीन दिनोंकी सारी क्रियाएँ दसवें दिनके समान समझनी चाहिये।)॥ १–१८$\frac{१}{२}$॥

एक मासके शिशुको 'पूतना' नामकी ग्रही ग्रहण करती है। उसका स्वरूप शकुनि (पक्षिणी—बकी)-का है। इससे पीड़ित बालक कौएके समान काँव-काँव करता, रोता, लंबी साँसें लेता, आँखोंको बारंबार मींचता और मूत्रके समान गन्धसे युक्त होता है। ऐसे बालकको गोमूत्रसे स्नान कराना और गोदन्तसे धूपित करना चाहिये। 'पूतना'के उद्देश्यसे ग्रामकी दक्षिणदिशामें करञ्जवृक्षके नीचे एक सप्ताहतक प्रतिदिन पीतवस्त्र, रक्तमाल्य, गन्ध, तैल, दीप, त्रिविध पायसान्न, तिल और पूर्वोक्त पदार्थोंकी बलि दे। दो मासके शिशुको 'मुकुटा' नामकी ग्रही ग्रहण करती है। इससे आक्रान्त शिशुका शरीर पीला और ठण्डा पड़ जाता है। उसको सर्दी होती है, नाकसे पानी गिरता है और मुख सूख जाता है। इस ग्रहीके निमित्त पुष्प, गन्ध, वस्त्र, मालपूए, भात और दीपककी बलि प्रदान करे। इससे ग्रस्त बालकको कृष्णागुरु और सुगन्धबाला आदिसे धूपित करे। बालकको तृतीय मासमें 'गोमुखी' ग्रहण करती है। इससे आक्रान्त शिशु बहुत नींद लेता है, बारंबार मलमूत्र करता है और जोर-जोरसे रोता है। 'गोमुखी'को पहले यव, प्रियङ्गु, कुल्माष, शाक, भात और दूधकी पूर्व दिशामें बलि देनी चाहिये। तदनन्तर मध्याह्नकालमें शिशुको पञ्चभङ्ग* या पञ्चपत्रसे स्नान कराकर घीसे धूपित करे। चतुर्थ मासमें 'पिङ्गला' नामकी ग्रही बालकको पीड़ित करती है। इससे गृहीत बालकका शरीर सफेद और दुर्गन्धयुक्त होकर सूखने लगता है। ऐसे शिशुकी मृत्यु अवश्य हो जाती है। पाँचवीं 'ललना' नामकी ग्रही होती है। इससे पीड़ित शिशुका शरीर शिथिल होता है और मुख सूखने लगता है। उसकी देह पीली पड़ जाती है और अपानवायु निकलती है। 'ललना'की शान्तिके लिये दक्षिणदिशामें पूर्वोक्त पदार्थोंकी बलि दे। छठे मासमें 'पङ्कजा' नामकी ग्रही शिशुको पीड़ित करती है। इससे गृहीत शिशुकी चेष्टाएँ रुदन और विकृत स्वर आदि हैं। 'पङ्कजा'को भी पूर्वोक्त पदार्थ, भात, पुष्प, गन्ध आदिकी बलि प्रदान करे। सातवें महीनेमें 'निराहारा' नामकी ग्रही


* पलाश, गूलर, पीपल, वट और बेलके पत्ते 'पञ्चपत्र' या 'पञ्चभङ्ग कहलाते हैं।'