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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 641, कुल 878 में से

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पृष्ठ 641
६१४* अग्निपुराण *

भोजनसे और गुरु एवं देवताके कोपसे मनुष्यको पाँच प्रकारके उन्माद होते हैं। वे वातज, कफज, पित्तज, सन्निपातज और आगन्तुक कहे जाते हैं। भगवान् रुद्रके क्रोधसे अनेक प्रकारके देवादि ग्रह उत्पन्न हुए। वे ग्रह नदी, तालाब, पोखरे, पर्वत, उपवन, पुल, नदी-संगम, शून्य गृह, बिलद्वार और एकान्तवर्ती इकले वृक्षपर रहते और वहाँ जानेवाले पुरुषोंको पकड़ते हैं। इसके सिवा वे सोयी हुई गर्भवती स्त्रीको, जिसका ऋतुकाल निकट है उस नारीको, नंगी औरतको तथा जो ऋतुस्नान कर रही हो, ऐसी स्त्रीको भी पकड़ते हैं। मनुष्योंके अपमान, वैर, विघ्न, भाग्यमें उलट-फेर इन ग्रहोंसे ही होते हैं। जो मनुष्य देवता, गुरु, धर्मादि तथा सदाचार आदिका उल्लङ्घन करता है, पर्वत और वृक्ष आदिसे गिरता है, अपने केशोंको बार-बार नोचता है तथा लाल आँखें किये रुदन और नर्तन करता है, उसको 'रूप'-ग्रहविशेषसे पीड़ित जानना चाहिये। जो मानव उद्वेगयुक्त, दाह और शूलसे पीड़ित, भूख-प्याससे व्याकुल और शिरोरोगसे आतुर होता और 'मुझे दो, मुझे दो'—यों कहकर याचना करता है, उसे 'बलिकामी' ग्रहसे पीड़ित जाने। स्त्री, माला, स्नान और सम्भोगकी इच्छासे युक्त मनुष्यको 'रतिकामी' ग्रहसे गृहीत समझना चाहिये॥ १—८॥

व्योमव्यापी, महासुदर्शनमन्त्र, विटपनासिक, पातालनारसिंहादि मन्त्र तथा चण्डीमन्त्र—ये ग्रहोंका मर्दन—ग्रहपीड़ाका निवारण करनेवाले हैं*॥ ९॥

(अब ग्रहपीडानाशन भगवान् सूर्यकी आराधना बतलाते हैं—) सूर्यदेव अपने दाहिने हाथोंमें पाश, अङ्कुश, अक्षमाला और कपाल तथा बायें हाथोंमें खट्वाङ्ग, कमल, चक्र और शक्ति धारण करते हैं। उनके चार मुख हैं। वे आठ भुजा और बारह नेत्र धारण करते हैं। सूर्यमण्डलके भीतर कमलके आसनपर विराजमान हैं और आदित्यादि देवगणोंसे घिरे हुए हैं। इस प्रकार उनका ध्यान और पूजन करके सूर्योदयकालमें उन्हें अर्घ्य दे। अर्घ्यदानका मन्त्र इस प्रकार है—श्वास (य), विष (ओं), अग्रिमान् रण्डी (र्+ओं), हल्लेखा (ह्रीं)—ये संकेताक्षर हैं। इन सबको जोड़कर शुद्ध मन्त्र हुआ—) 'यौं रौं ऐं ह्रीं कलशार्कायभूर्भुवः स्वरों ज्वालिनीकुलमुद्धर'॥ १०—१२$\frac{१}{२}$॥

ग्रहोंका ध्यान

सूर्यदेव कमलके आसनपर विराजमान हैं। उनकी अङ्गकान्ति अरुण है। वे रक्तवस्त्र धारण करते हैं। उनका मण्डल ज्योतिर्मय है। वे उदार स्वभावके हैं और दोनों हाथोंमें कमल धारण करते हैं। उनकी प्रकृति सौम्य है तथा सारे अङ्ग दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। सूर्य आदि सभी ग्रह सौम्य, बलदायक तथा कमलधारी हैं। उन सबका वस्त्र विद्युत्-पुञ्जके समान प्रकाशमान है। चन्द्रमा श्वेत, मङ्गल और बुध लाल, बृहस्पति पीतवर्ण, शुक्र शुक्लवर्ण, शनैश्चर काले कोयलेके समान कृष्ण तथा राहु और केतु धूमके समान


* 'सहस्रार हुं फट्'—यह 'सुदर्शन' या 'महासुदर्शनमन्त्र' है। यह व्यापक प्रभावशाली होनेके कारण 'व्योमव्यापी' कहा गया है। 'विटपनासिक' शब्द नृसिंहरूपकी उग्रताका सूचक है। बड़े-बड़े वृक्ष उनकी नासिकाके अन्तर्गत आ जाते हैं। पृथ्वी और पाताललोकमें उनका प्रताप फैला हुआ है तथा पाताललोकमें उनका प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिये भी उनको 'पातालनारसिंह' कहते हैं।

'पातालनारसिंहमन्त्र' इस प्रकार है—

'उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥'

दुर्गासप्तशतीके सभी मन्त्र यहाँ 'चण्डीमन्त्र'के नामसे अभिहित हुए हैं। 'नारसिंहाद्या'के आदि पदसे 'वीरनृसिंह' तथा 'सुदर्शन-नृसिंहादि' मन्त्र समझने चाहिये। 'वीरनृसिंह-मन्त्र' इस प्रकार है—'ॐ नमो भगवते वीरनृसिंहाय ज्वालामालापिनद्धाङ्गायाग्निनेत्राय सर्वभूतविनाशनाय दह दह पच पच रक्ष रक्ष ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा।' इसका एक दूसरा रूप इस प्रकार भी है—'ॐ नमो भगवते वीरनृसिंहाय ज्वालामालिने दीप्तदंष्ट्रायाग्निनेत्राय सर्वरक्षोघ्नाय सर्वभूतविनाशनाय सर्वज्वरं विनाशय हन हन दह दह पच पच बन्ध बन्ध रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।' 'सुदर्शन-नृसिंहमन्त्र इस प्रकार है—'ॐ सहस्रारज्वालावर्तिने क्षौं हन हन हुं फट् स्वाहा।'

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