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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 647, कुल 878 में से

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पृष्ठ 647

६२० * अग्निपुराण *


पीये। इससे उसको पुत्रकी प्राप्ति होती है। पुत्रार्थिनी नारी 'श्री' नामक ओषधिकी जड़ और वटके अङ्कुरको दूधके साथ पीये। श्री, वटाङ्कुर और दूर्वा—इनके रसका नस्य ले और पीये भी। 'श्री' और 'कमल' की जड़को, अश्वत्थ और उत्तरके मूलको दूधके साथ पीये। कपासके फल और पल्लवको दूधमें पीसकर तरल बनाकर पीये। अपामार्गके नूतन पुष्पाग्रको भैंसके दूधके साथ पीये। उपर्युक्त साढ़े पाँच श्लोकोंमें पुत्रप्राप्तिके चार योग बताये गये हैं॥ १७–२१ $\frac{१}{२}$॥

यदि स्त्रीका गर्भ गलित हो जाता हो तो उसे शक्कर, कमलके फूल, कमलगट्टा, लोध, चन्दन और सारिवालता—इनको चावलके पानीमें पीसकर दे या लाजा, यष्टि (मुलहठी), सिता (मिश्री), द्राक्षा, मधु और घी—इन सबका अवलेह बनाकर वह स्त्री चाटे॥ २२–२३॥

आटरूप (अडूसा), कलाङ्गली, काकमाची, शिफा (जटामांसी)—इन सबको नाभिके नीचे पीसकर छाप दे तो स्त्री सुखपूर्वक प्रसव कर सकती है॥ २४॥

लाल और सफेद जवाकुसुम, लाल चीता और हींगपत्री पीये। केसर, भटकटैयाकी जड़, गोपी, षष्ठी (साठीका तृण) और उत्पल—इनको बकरीके दूधमें पीसकर तैल मिलाकर खाय तो सिरमें बाल उगते हैं। अगर सिरके बाल झड़ रहे हों तो यह उनको रोकनेका उपाय है॥ २५–२६॥

आँवला और भँगरेयाका एक सेर तैल, एक आढक दूध, षष्ठी और अञ्जनका एक पल तैल—ये सब सिरके बाल, नेत्र और सिरके लिये हितकारक होते हैं॥ २७॥

हल्दी, राजवृक्षकी छाल, चिञ्चा (इमलीका बीज), नमक, लोध और पीली खारी—ये गौओंके पेट फूलनेकी बीमारीको तत्काल रोक देते हैं॥ २८॥

'ॐ नमो भगवते त्र्यम्बकायोपशमयोपशमय चुलु चुलु मिलि मिलि भिदि भिदि गोमानिनि चक्रिणि हूं फट्। अस्मिन् ग्रामे गोकुलस्य रक्षां कुरु शान्तिं कुरु कुरु कुरु ठ ठ ठ'॥ २९–३०॥

यह गोसमुदायकी रक्षाका मन्त्र है।

'घण्टाकर्ण महासेन वीर बड़े बलवान् कहे गये हैं। वे जगदीश्वर महामारीका नाश करनेवाले हैं, अतः मेरी रक्षा करें।' ये दोनों श्लोक और मन्त्र गोरक्षक हैं, इनको लिखकर घरपर टाँग देना चाहिये॥ ३१॥

इति प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'नाना प्रकारके मन्त्र और औषधोंका कथन' नामक तीन सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०२॥


तीन सौ तीनवाँ अध्याय

अष्टाक्षर मन्त्र तथा उसकी न्यासादि विधि

जब चन्द्रमा जन्म-नक्षत्रपर हों और सूर्य सातवीं राशिपर हो तो उसे 'पूषाका काल' समझना चाहिये। उस समय श्वासकी परीक्षा करे। जिसके कण्ठ और ओष्ठ अपने स्थानसे चलित हो रहे हों, जिसकी नाक टेढ़ी हो गयी और जीभ काली पड़ गयी हो, उसका जीवन अधिक-से-अधिक सात दिन और रह सकता है॥ १–२॥

तार (ॐ), मेष (न), विष (म), दन्ती (ओ), दीर्घस्वरयुक्त 'न' तथा 'र' (ना रा), 'य णा', रस (य)—यह भगवान् विष्णुका अष्टाक्षर-मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय) है।* इसका अङ्गन्यास इस प्रकार है—


* 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' के अनुसार इस मन्त्रका विनियोग-वाक्य इस प्रकार होना चाहिये—ॐ अस्य श्रीअष्टाक्षरमहामन्त्रस्य साध्यनारायणऋषिः, गायत्री छन्दः, परमात्मा देवता सर्वाभीष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः। (द्रष्टव्यः सप्तविंश श्वास, श्लोक १३-१४)