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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 650, कुल 878 में से

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पृष्ठ 650
  • अध्याय ३०४ * ६२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

यदि स्वप्न शुभ एवं सिद्धिसूचक हुए तो उनसे मन्त्र तथा इष्टदेवके प्रति भक्ति बढ़ती है। तत्पश्चात् पुनः मण्डलार्चन करना चाहिये। 'सर्वतोभद्र' आदि मण्डल पहले बताये गये हैं। उन्हींमेंसे किसी एकका पूजन करना चाहिये। पूजित हुआ मण्डल सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता है॥ ११॥

पहले स्नान और आचमन करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक देहमें मिट्टी लगाये। फिर पूर्ववत् कल्पित शिवतीर्थमें साधक अघमर्षण-मन्त्रके जपपूर्वक स्नान करे। फिर विद्वान् पुरुष हस्ताभिषेक$^१$ (हाथोंकी शुद्धि) करके पूजागृहमें प्रवेश करे। मूलमन्त्रसे योगपीठपर कमलासनका न्यास (चिन्तन) करे। मूलसे ही पूरक, कुम्भक तथा रेचक प्राणायाम करे॥ १२-१३॥

(सुषुम्णा नाड़ीके मार्गसे) जीवात्माको ऊपर ब्रह्मरन्ध्रस्थित सहस्रारचक्रमें ले जाकर परमात्मामें योजित (स्थापित) कर दे। सिरसे लेकर शिखापर्यन्त जो बारह अङ्गुल विस्तृत स्थान है, वही 'ब्रह्मरन्ध्र' है। उसीमें स्थित परमात्माके भीतर जीवको ('हंसः सोऽहम्'—इस मन्त्रद्वारा) संयोजित करनेके पश्चात् (यह चिन्तन करे कि सम्पूर्ण भूतोंके तत्त्व बीजरूपसे अपने-अपने कारणमें संहारक्रमसे विलीन हो गये हैं। इस प्रकार प्रकृतिपर्यन्त समस्त तत्त्वोंका परमात्मामें लय हो गया है। तदनन्तर) वायुबीज (यकार)-के द्वारा वायुको प्रकट करके उसके द्वारा अपने शरीरको सुखा दे। इसके बाद अग्निबीज (रकार)-से अग्नि प्रकट करके उसके द्वारा उस समस्त शुष्क शरीरको जलाकर भस्म कर दे। (उसमेंसे दग्ध हुए पापपुरुषके भस्मको विलगकर) अपने शरीरके भस्मको अमृतबीज (वकार)-से प्रकट अमृतकी धारासे आप्लावित कर दे॥ १४॥

(इसके बाद विलीन हुए प्रत्येक तत्त्वके बीजको अपने-अपने स्थानपर पहुँचाकर दिव्य शरीरका निर्माण करे।) दिव्य स्वरूपका ध्यान करके जीवात्माको पुनः ले आकर हृदयकमलमें स्थापित कर दे। ऐसा करनेसे आत्मशुद्धि सम्पादित होती है। तदनन्तर न्यास करके पूजन आरम्भ करे॥ १५॥

पञ्चाक्षर-मन्त्रके न, म आदि पाँच वर्ण क्रमशः कृष्ण, श्वेत, श्याम, रक्त और पीत कान्तिवाले हैं। नकारादि अक्षरोंसे क्रमशः अङ्गन्यास करे। उन्हीं अङ्गोंमें तत्पुरुष आदि पाँच मूर्तियोंका भी न्यास करना चाहिये$^२$॥ १६॥

तदनन्तर अङ्गुष्ठसे कनिष्ठापर्यन्त पाँच अँगुलियोंमें क्रमशः अङ्गमन्त्रोंका सर्वतोभावेन न्यास$^३$ करके पाद, गुह्य, हृदय, मुख तथा मूर्धामें मन्त्राक्षरोंका न्यास$^४$ करे। इसके बाद मूर्धा, मुख, हृदय, गुह्य और पाद—इन अङ्गोंमें व्यापक-न्यास$^५$ करके मूलमन्त्रके अक्षरोंका तथा अङ्गमन्त्रोंका भी वहीं


१. करशुद्धिका एक प्रकार यह भी है—अङ्गुष्ठ आदि सभी अँगुलियोंमें, दोनों हाथोंके अन्तर्भागमें, बाह्यभागमें तथा दोनों हाथोंके पार्श्वभागमें अस्त्रमन्त्र (फट्)-का व्यापकन्यास किया जाय।
२. इसका प्रयोग इस प्रकार है। पहले निम्नाङ्कित रूपसे मूर्तिसहित करन्यास करे—'नं तत्पुरुषाय नमः तर्जन्योः। मं अघोराय नमः मध्यमयोः। शिं सद्योजाताय नमः कनिष्ठिकयोः। वां वामदेवाय नमः अनामिकयोः। यं ईशानाय नमः अङ्गुष्ठयोः।' तत्पश्चात् अङ्गन्याससहित मूर्तिन्यास करे। यथा—'नं तत्पुरुषाय हृदयाय नमः। मं अघोराय शिरसे स्वाहा। शिं सद्योजाताय शिखायै वषट्। वां वामदेवाय कवचाय हुम्। यं ईशानाय अस्त्राय फट्।' करन्यासमें यहाँ मध्यमाके बाद कनिष्ठा, फिर अनामिका, तत्पश्चात् अङ्गुष्ठका क्रम 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'के तीसवें श्वास तथा 'शारदातिलक'के अठारहवें पटलके अनुसार है।
३. प्रयोग इस प्रकार है—नं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। मं तर्जनीभ्यां स्वाहा। शिं मध्यमाभ्यां वषट्। वां अनामिकाभ्यां हुम्। यं कनिष्ठिकाभ्यां फट्।
४. नं पादयोः न्यस्यामि। मं गुह्ये न्यस्यामि। शिं हृदये न्यस्यामि। वां मुखे न्यस्यामि। यं मूर्धनि न्यस्यामि।
५. व्यापकन्यास 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र' (श्वास ३०) तथा 'शारदातिलक' (पटल १८)-में इस प्रकार कहा गया है—
$$\begin{array}{lcl} \text{नमोऽस्तु स्थाणुभूताय} & \text{ज्योतिर्लिङ्गामृतात्मने।} & \text{चतुर्मूर्तिवपुश्छायाभासिताङ्गाय} & \text{शम्भवे॥} \ \text{इति} & \text{मन्त्रेण} & \text{मूर्धादिपादपर्यन्तं} & \text{व्यापकं} & \text{न्यसेत्।} \end{array}$$