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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 878 में से

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पृष्ठ 652
* अध्याय ३०५ *६२५

दण्ड, खड्ग, पाश, ध्वज, गदा, शूल, चक्र और पद्मका पूजन करे*। इस प्रकार छः आवरणोंसहित इष्टदेवताकी पूजा करके गुरु अधिवासित शिष्यको पञ्चगव्यपान कराये। फिर आचमन कर लेनेपर उसका प्रोक्षण करे। इसके बाद नेत्रान्त अर्थात् नूतन शुक्ल वस्त्रकी पट्टीसे नेत्र-मन्त्र (वौषट्)-का उच्चारण करते हुए गुरु शिष्यके नेत्रोंको बाँध दे। फिर उस शिष्यको मण्डपके दक्षिणद्वारमें प्रवेश कराये। वहाँ आसन आदि या कुशपर बैठे हुए शिष्यका गुरु शोधन करे। पूर्वोक्त रीतिसे शरीर आदि पाञ्चभौतिक तत्त्वोंका क्रमशः संहार करके शिष्यका परमात्मामें लय किया जाय; फिर सृष्टिमार्गसे देशिक शिष्यका पुनरुत्पादन करे। इसके बाद उस शिष्यके दिव्य शरीरमें न्यास करके उसे प्रदक्षिणक्रमसे पश्चिमद्वारपर लाकर उसके द्वारा पुष्पाञ्जलिका क्षेपण कराये। जिस देवताके ऊपर वे फूल गिरें, उसके नामको आदिमें रखते हुए शिष्यके नामका निर्देश करे। तत्पश्चात् (नेत्रका बन्धन खोलकर) यज्ञभूमिके पार्श्वभागमें सुन्दर नाभि और मेखलासे युक्त खुदे हुए कुण्डमें शिवाग्निको प्रकट कराकर, स्वयं उसका पूजन करके, फिर शिष्यसे भी उसकी अर्चना कराये। फिर ध्यानद्वारा आत्मसदृश शिष्यको संहारक्रमसे अपनेमें लीन करके पुनः उसका सृष्टिक्रमसे उत्पादन करे। तदनन्तर उसके हाथमें अभिमन्त्रित कुश दे और हृदयादि मन्त्रोंद्वारा पृथिवी आदि तत्त्वोंके लिये आहुति प्रदान करे॥ ३१—३८॥

पृथ्वी, जल, तेज और वायु—इनमेंसे प्रत्येकके लिये इनके नाम-मन्त्रसे सौ-सौ आहुतियाँ देकर आकाशतत्त्वके लिये मूलमन्त्र (ॐ नमः शिवाय)—से सौ आहुतियाँ दे। इस प्रकार हवन करके उसकी पूर्णाहुति करे। फिर अस्त्र-मन्त्र (फट्)-का उच्चारण करके आठ आहुतियाँ दे। तत्पश्चात् विशेष शुद्धिके लिये प्रायश्चित्त (होम या गोदान) करे। अभिमन्त्रित कलशका पूजन कर पीठस्थित शिष्यका अभिषेक करे। फिर गुरु शिष्यको समयाचार सिखावे। शिष्य स्वर्ण-मुद्रा आदिके द्वारा अपने गुरुका पूजन करे। इस प्रकार यहाँ 'शिवपञ्चाक्षर' मन्त्रकी दीक्षा बतायी गयी। इसी तरह विष्णु आदि देवताओंके मन्त्रोंकी भी दीक्षा दी जाती है॥ ३९—४१॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'पञ्चाक्षरमन्त्रकी दीक्षाके विधानका वर्णन' नामक तीन सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०४॥


तीन सौ पाँचवाँ अध्याय

पचपन विष्णुनाम

अग्निदेव कहते हैं— मुने! जो मनुष्य भगवान् विष्णुके निम्नाङ्कित पचपन नामोंका जप करता है, वह मन्त्रजप आदिके फलका भागी होता है तथा तीर्थोंमें पूजनादिके अक्षय पुण्यको प्राप्त करता है। पुष्करमें पुण्डरीकाक्ष, गयामें गदाधर, चित्रकूटमें राघव, प्रभासमें दैत्यसूदन, जयन्तीमें जय, हस्तिनापुरमें जयन्त, वर्धमानमें वाराह, काश्मीरमें चक्रपाणि, कुब्जाभ (या कुब्जास्र)-में


* 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'में पूजनके मन्त्र इस प्रकार दिये गये हैं—'देवाग्रभागमारभ्य लं इन्द्राय सुराधिपतये पीतवर्णाय वज्रहस्ताय ऐरावतवाहनाय नमः। इं अग्नये तेजोऽधिपतये रक्तवर्णाय शक्तिहस्ताय मेषवाहनाय नमः। हं यमाय प्रेताधिपतये कृष्णवर्णाय दण्डहस्ताय महिषवाहनाय नमः। क्षं नेत्रत्रये रक्षोऽधिपतये धूम्रवर्णाय खड्गहस्ताय प्रेतवाहनाय नमः। वं वरुणाय यादसाम्पतये शुक्लवर्णाय पाशहस्ताय मकरवाहनाय नमः। यं वायवे प्राणाधिपतये धूम्रवर्णाय अङ्कुशहस्ताय मृगवाहनाय नमः। ह्रीं ईशानाय विद्याधिपतये स्फटिकवर्णाय शूलहस्ताय वृषभवाहनाय नमः। इति सम्पूज्य इन्द्रेशानयोर्मध्ये—आं ब्रह्मणे लोकाधिपतये रक्तवर्णाय पद्महस्ताय हंसवाहनाय नमः। निर्ऋतिवरुणयोर्मध्ये—ह्रीं अनन्ताय नागाधिपतये गौरवर्णाय चक्रहस्ताय गरुडवाहनाय नमः। इति सम्पूज्य द्वितीयवीथ्याम्—वज्राय नमः। शक्तये०। दण्डाय०। खड्गाय०। पाशाय०। अङ्कुशाय०। गदायै०। त्रिशूलाय०। पद्माय०। चक्राय०। इस प्रकार इन-इन आयुधोंका उन-उन दिक्पालोंके निकटवर्ती स्थानमें पूजन करना चाहिये।'