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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 878 में से

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पृष्ठ 654
  • अध्याय ३०६ * ६२७

तीन सौ छठा अध्याय श्रीनरसिंह आदिके मन्त्र

अग्निदेव कहते हैं—मुने! स्तम्भन, विद्वेषण, उच्चाटन, उत्सादन, भ्रामण, मारण तथा व्याधि—ये ‘क्षुद्र’संज्ञक आभिचारिक कर्म हैं। इनसे छुटकारा कैसे प्राप्त हो? यह बात बताऊँगा; सुनो—॥ १ ॥

‘ॐ नमो भगवते उन्मत्तरुद्राय भ्रम भ्रम भ्रामय भ्रामय अमुकं वित्रासय वित्रासय उद्भ्रामय उद्भ्रामय रुद्र रौद्रेण रूपेण हूं फट् स्वाहा’१॥ २ ॥

श्मशान-भूमिमें रातको इस मन्त्रका तीन लाख जप करे। फिर चिताकी आगमें धतूरेकी समिधाओं‌द्वारा हवन करे। इस प्रयोगसे शत्रु सदा भ्रान्त होता—चक्करमें पड़ा रहता है। सुनहरे गेरूसे शत्रु की प्रतिमा बनाकर उक्त मन्त्रका जप करे। फिर मन्त्रजपसे अभिमन्त्रित की हुई सोनेकी सूइयोंसे उस प्रतिमाके कण्ठ अथवा हृदयको बींधे। इस प्रयोगसे शत्रु की मृत्यु हो जाती है। गधेका बाल (अथवा खराश्वा—मयूरशिखा नामक ओषधिके पत्ते), चिताका भस्म, ब्रह्मदण्डी (ब्रह्मदारु या तूतकी लकड़ी) तथा मर्कटी (करंजभेद)—इन सबको जलाकर भस्म (चूर्ण) बना ले। उस भस्म या चूर्णको उक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उत्सादनका प्रयोग करनेवाला पुरुष शत्रुके घरपर अथवा उसके मस्तकपर फेंक दे२॥ ३-५॥

भृगु (स) आकाश (ह), दीप्त (दीर्घ आकारयुक्त) रेफसहित भृगु (स) अर्थात् (सहस्रा), फिर र, वर्म (हुम्) और फट् इस प्रकार सब मिलकर मन्त्र बना—‘सहस्रार हुं फट्।’ इसका अङ्गन्यास इस प्रकार है—‘आचक्राय स्वाहा, हृदयाय नमः। विचक्राय स्वाहा, शिरसे स्वाहा। सुचक्राय स्वाहा, शिखायै वषट्। धीचक्राय स्वाहा, कवचाय हुम्। संचक्राय स्वाहा, नेत्रत्रयाय वौषट्। ज्वालाचक्राय स्वाहा, अस्त्राय फट्।’ ये न्यास पूर्ववत् कहे गये हैं।३ अङ्गन्यासपूर्वक जपा हुआ सुदर्शनचक्र मन्त्र पूर्वोक्त ‘क्षुद्र’संज्ञक अभिचारों तथा ग्रहबाधाओंको हर लेनेवाला और समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है॥ ६–८॥

उक्त सुदर्शन-मन्त्रके छः अक्षरोंका क्रमशः मूर्धा, नेत्र, मुख, हृदय, गुह्य तथा चरण—इन छः अङ्गोंमें न्यास करे। इसके बाद चक्रस्वरूप भगवान् विष्णुका ध्यान करे—‘भगवान् चक्राकार कमलके आसनपर विराजमान हैं। उनकी आभा


१. ‘तन्त्रसार-संग्रह’ १७ वें पटल, श्लोक ३०में भी इस मन्त्रका यही रूप है। इस मन्त्रका अङ्गन्यास इस प्रकार करना चाहिये— ‘ॐ नमो भगवते हृदयाय नमः। उन्मत्तरुद्राय शिरसे स्वाहा। भ्रम भ्रम भ्रामय भ्रामय शिखायै वषट्। अमुकं वित्रासय वित्रासय कवचाय हुम्। उद्भ्रामयोद्भ्रामय नेत्रत्रयाय वौषट्। रुद्र रौद्रेण रूपेण हुं फट् स्वाहा अस्त्राय फट्।’

२. ‘तन्त्रसार-संग्रह’ में इस श्लोकका पाठ इस प्रकार मिलता है— सप्तग्रामोत्थवल्मीकमृत्स्त्राविषतरुत्वचौ । कर्ण्यग्रिमन्थवन्दाकौ पक्षौ मूकद्विषद्विषोः ॥ खरवालं चिताभस्म ब्रह्मदण्डी च मर्कटी। गृहे वा मूर्ध्नि तच्चूर्णं क्षिप्तमुत्सादनं रिपोः ॥ (१७ पटल, श्लोक ७०-७२) ‘सात गाँवोंके बिमॉटकी मिट्टी, विषवृक्षकी छाल, कर्णी (कमलगट्टा), अग्रीमन्थवन्दाक (वस्तुविशेष), काकपंslug, उल्लूकी पाँख, खरबाल, चिताभस्म, ब्रह्मदण्डी (शहतूतकी लकड़ी) और मर्कटी (करंज)—इन दस वस्तुओंका भस्म-चूर्ण यदि शत्रुके घरपर या उसके मस्तकपर डाल दिया जाय तो उसका उत्सादन (उजड़कर अन्यत्र जाना अथवा वहीं नष्ट हो जाना ) होता है।’

३. ‘शारदातिलक’में यहाँ आत्मरक्षाके लिये दिग्बन्ध करने और अग्निमय प्राकार (चहारदीवारी) निर्माण करनेकी आवश्यकता बताते हुए दिग्बन्ध-मन्त्र एवं अग्नि-प्राकार-मन्त्र—दिये गये हैं, जो इस प्रकार हैं—‘ॐ ऐन्द्रीं (आग्नेयीम् इत्यादि) चक्रेण बध्नामि नमश्चक्राय स्वाहा’—यह ‘दिग्बन्ध’ है तथा ‘ॐ त्रैलोक्यं रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।’—यह अग्निमय-प्राकारमन्त्र है। द्रष्टव्य—पटल १५, श्लोक ७५।