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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 656, कुल 878 में से

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पृष्ठ 656
  • अध्याय ३०७ * ६२९

तीन सौ सातवाँ अध्याय

त्रैलोक्यमोहन आदि मन्त्र

अग्निदेव कहते हैं—मुने! अब मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धिके लिये 'त्रैलोक्यमोहन' नामक मन्त्रका वर्णन करूँगा॥ १॥

ॐ श्रीं ह्रीं हूं ओम्, ॐ नमः पुरुषोत्तम पुरुषोत्तमप्रतिरूप लक्ष्मीनिकास सकलजगत्क्षोभण सर्वस्त्रीहृदयदारण त्रिभुवनमदोन्मादकर सुर-मनुजसुन्दरीजनमनांसि तापय तापय दीपय दीपय शोषय शोषय मारय मारय स्तम्भय स्तम्भय द्रावय द्रावयाकर्षयाकर्षय परमसुभग सर्वसौभाग्यकर कामप्रदामुकं (शत्रुम्) हन हन चक्रेण गदया खड्ङ्गेन सर्वबाणैर्भिन्द भिन्द पाशेन कट्ट कट्ट अङ्कुशेन ताडय ताडय त्वर त्वर किं तिष्ठसि यावत्तावत् समीहितं मे सिद्धं भवति हुं फट्, नमः * ॥ २ ॥

ॐ पुरुषोत्तम त्रिभुवनमदोन्मादकर हुं फट् हृदयाय नमः। सुरमनुजसुन्दरीमनांसि तापय तापय शिरसे स्वाहा। दीपय दीपय शोषय शोषय मारय मारय स्तम्भय स्तम्भय द्रावय द्रावय कवचाय हुम्। आकर्षयाकर्षय महाबल हुं फट् नेत्रत्रयाय वौषट्। त्रिभुवनेश्वर सर्वजनमनांसि हन हन दारय दारय ॐ मम वशमानयानय हुं फट् अस्त्राय फट्। त्रैलोक्यमोहन हृषीकेशाप्रतिरूप सर्वस्त्री-हृदयाकर्षण आगच्छ-आगच्छ नमः । (सर्वाङ्गे) व्यापकम् ॥ ३ ॥

इस प्रकार मूलमन्त्रयुक्त व्यापक न्यास बताया गया। फिर पूजन तथा पचास हजारकी संख्यामें जप करके अभिषेक करे। तत्पश्चात् वैदिक विधिसे स्थापित कुण्डाग्निमें सौ बार आहुति दे। दही, घी, खीर, सघृत चरु तथा औटाये हुए दूधकी पृथक्-पृथक् बारह-बारह आहुतियाँ मूलमन्त्रसे दे। फिर अक्षत, तिल और यवकी एक हजार आहुतियाँ देनेके पश्चात् त्रिमधु, पुष्प, फल, दही तथा समिधाओंकी सौ-सौ बार आहुतियाँ दे ॥ ४–६ ॥

तदनन्तर पूर्णाहुति-होम करके हुतावशिष्ट सघृत चरुका प्राशन करे-कराये। फिर ब्राह्मण-भोजन कराकर आचार्यको उचित दक्षिणा आदिसे संतुष्ट करे। यों करनेसे मन्त्र सिद्ध होता है। स्नान करके विधिवत् आचमन करे और मौनभावसे यागमन्दिरमें जाकर पद्मासनसे बैठे और तान्त्रिक विधिके अनुसार शरीरका शोषण करे। पहले राक्षसों तथा विघ्नकारक भूतोंका दमन करनेके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें सुदर्शनका न्यास करे। साथ ही यह भावना करे कि वह सुदर्शन अस्त्र पाँच क्लेशोंके बीजभूत, धूम्रवर्ण एवं प्रचण्ड अनिलरूप मेरे सम्पूर्ण पापको, जो नाभिमें स्थित है, शरीरसे अलग कर रहा है। फिर हृदयकमलमें स्थित 'रं' बीजका स्मरण करके ऊपर, नीचे तथा अगल-बगलमें फैली हुई अग्निकी ज्वालाओंसे उस पाप-पुञ्जको जलाकर भस्म कर दे। फिर


* इस मन्त्रका अर्थ यों है—'ॐ श्रीं ह्रीं हूं ओम् सच्चिदानन्दस्वरूप पुरुषोत्तम! पुरुषोत्तमप्रतिरूप! लक्ष्मीनिकेतन! आप अपने सौन्दर्यसे सम्पूर्ण जगत्को क्षुब्ध कर देनेमें समर्थ हैं। समस्त स्त्रियोंके हृदयको दरण-उन्मथित कर देनेवाले हैं। त्रिभुवनको मदोन्मत्त कर देनेकी शक्ति रखते हैं। देवसुन्दरियों तथा मानवसुन्दरियोंके मनको (प्रीति-अग्निमें) तपाइये, तपाइये; उनके रागको उद्दीप्त कीजिये, उद्दीप्त कीजिये; सोखिये, सोखिये; मारिये, मारिये; उनका स्तम्भन कीजिये; स्तम्भन कीजिये; द्रवित कीजिये, द्रवित कीजिये; आकर्षित कीजिये, आकर्षित कीजिये। परम सौभाग्यनिधे! सर्वसौभाग्यकारी प्रभो! आप सबकी मनोवाञ्छित कामना पूर्ण करनेवाले हैं। मेरे अमुक शत्रु का हनन कीजिये, हनन कीजिये। चक्रसे, गदासे और खड्गसे; समस्त बाणोंसे बेधिये, बेधिये। पाशसे आवृत्त कीजिये, बाँध लीजिये। अङ्कुशसे ताडित कीजिये, ताडित कीजिये। जल्दी कीजिये, जल्दी कीजिये। क्यों रुकते या ठहरते हैं? जबतक मेरा सारा मनोरथ पूर्ण न हो जाय, तबतक यत्नशील रहिये। हुं फट् नमः॥'