अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 679, कुल 878 में से
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है। इसके जपसे सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है॥ १-२॥
अमृत, अंशुमान्, इन्द्र, ईश्वर, उग्र, ऊहक्, एकपाद, ऐल, ओज, औषध, अंशुमान् और वशी—ये क्रमशः अकार आदि बारह स्वरोंके वाचक हैं (यथा—अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः)। तथा आगे जो शब्द दिये जा रहे हैं, ये ककार आदि अक्षरोंके सूचक हैं। कामदेव, शिखण्डी, गणेश, काल, शंकर, एकनेत्र, द्विनेत्र, त्रिशिख, दीर्घबाहु, एकपाद, अर्धचन्द्र, वलय, योगिनीप्रिय, शक्तीश्वर, महाग्रन्थि, तर्पक, स्थाणु, दन्तुर, निधीश, नन्दि, पद्म, शाकिनीप्रिय, मुखबिम्ब, भीषण, कृतान्त (यम), प्राण, तेजस्वी, शक्र, उदधि, श्रीकण्ठ, सिंह, शशाङ्क, विश्वरूप तथा नारसिंह (क्ष)। विश्वरूप अर्थात् हकारको बारह मात्राओंसे युक्त करके लिखे। (इस प्रकार ये बारह बीज होते हैं, जो अङ्गन्यास एवं करन्यासके उपयोगमें आते हैं।)॥ ३-८॥
विश्वरूप (ह)-को अंशुमान् (अनुस्वार) तथा ओज (ओकार)-से युक्त करके रखा जाय; उसमें शशिबीज (स)-का योग न किया जाय तो 'हौं'—यह प्रथम बीज उद्धृत होता है, जो 'ईशान'से सम्बद्ध है। उपर्युक्त बारह बीजोंमें पाँच ह्रस्वयुक्त बीज माने जाते हैं और छः दीर्घ-बीज। पहली और ग्यारहवीं मात्रामें एक ही 'हं' बीज बनता है। 'हं हिं हुं हैं हौं'—ये पाँच ह्रस्वयुक्त बीज हैं तथा शेष दीर्घयुक्त। ह्रस्व बीजोंमें विलोम-गणनासे (हौं) प्रथम है। शेष क्रमशः तृतीय, पञ्चम, सप्तम और नवम कहे गये हैं। द्वितीय आदि दीर्घ हैं। तृतीय बीज है—'हैं'। यह तत्पुरुष-सम्बन्धी बीज है, ऐसा जानो। पाँचवाँ बीज 'हुं' है, जो दक्षिणदिशावर्ती मुख—'अघोर'का बीज है। सातवाँ बीज है—'हिं'। इसे 'वामदेवका बीज' जानना चाहिये। इसके बाद रस (अमृत) संज्ञक मात्रा (अकार)-से युक्त सानुस्वार हकार अर्थात् 'हं' बीज है; वह उपर्युक्त गणनाक्रमसे नवाँ है और 'सद्योजात'से सम्बद्ध है। इस प्रकार उक्त पाँच बीजोंसे युक्त 'ईशान' आदि मुखोंको 'ब्रह्मपञ्चक' कहा गया है। इनके आदिमें 'प्रणव' तथा अन्तमें 'नमः' जोड़ दे। 'ईशान' आदि नामोंका चतुर्थ्यन्त प्रयोग करे तो सभी उनके लिये पूजोपयुक्त मन्त्र हो जाते हैं। यथा—'ॐ हौं ईशानाय नमः।' इत्यादि। इसी प्रकार 'ॐ हं सद्योजाताय नमः।' यह सद्योजात-देवताका मन्त्र है। द्वितीय, चतुर्थ आदि मात्राएँ दीर्घ हैं, अतः उनका हृदयादि अङ्गोंमें न्यास किया जाता है। द्वितीय बीजको बोलकर हृदय और अङ्ग-मन्त्र (नमः) बोलकर हृदयमें न्यास करे। यथा—'हां हृदयाय नमः, हृदि।' चतुर्थ बीज 'शिरोमन्त्र' है, जो हकारमें ईश्वर तथा अंशुमान् (ं) जोड़नेसे सम्पन्न होता है। यथा—'हीं शिरसे स्वाहा, शिरसि।' विश्वरूप (ह)-में ऊहक (ऊ) तथा अनुस्वार जोड़नेपर छठा बीज 'हूँ' बनता है। उसे 'शिखामन्त्र' जानना चाहिये। यथा—'हूं शिखायै वषट्, शिखायां हुम्।' अर्थात् कवचका मन्त्र आठवाँ बीज 'हैं' है। यथा—'हैं कवचाय हुम्—बाहुमूलयोः।' दसवाँ बीज 'हौं' नेत्र-मन्त्र कहा गया है। यथा—'हौं नेत्रत्रयाय वौषट्, नेत्रयोः।' अस्त्र-मन्त्र वशी (विसर्गयुक्त) है। शिखिध्वज! इसे शिवसंज्ञक माना गया है। यथा—'हः अस्त्राय फट्।' (इससे चारों ओर तर्जनी और अङ्गुष्ठद्वारा ताली बजाये।) हृदयादि अङ्गोंकी छः जातियाँ क्रमशः इस प्रकार हैं—नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् तथा फट्। अब मैं 'प्रासाद-मन्त्र' बताता हूँ। 'हीं हौं हूं'—ये प्रासादमन्त्रके तीन बीज हैं। इसे 'कुटिल' संज्ञा दी गयी है। इस प्रकार यह प्रासाद-मन्त्र समस्त कार्योंको सिद्ध करनेवाला है। हृदय-