अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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(२)—अर्थात् 'व्यूं' इसे पञ्चम बीजाक्षर बताया गया है। तत्पश्चात् सानुस्वार कृतान्त (मकार) अर्थात् 'मं' यह षष्ठ बीज है। सानुस्वार उदक और प्राण (व्यं) सप्तम बीजके रूपमें उद्धृत हुआ है। इन्दुयुक्त पद्म—'पं' आठवाँ तथा एकपादयुक्त नन्दीश 'नें' नवाँ बीज है। अन्तमें प्रथम बीज 'ओम्' का ही उल्लेख किया जाता है। इस प्रकार जो दशबीजात्मक मन्त्र है, इसे 'क्षपण' कहा गया है। इसका पहला, तीसरा, पाँचवाँ, सातवाँ तथा नवाँ बीज क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव और सद्योजातस्वरूप है। द्वितीय आदि बीज हृदयादि अङ्गन्यासमें उपयुक्त होते हैं। दसों प्रणवात्मक बीजोंके एक साथ उच्चारणपूर्वक 'अस्त्राय फट्' बोलकर अस्त्रन्यास^१ करे। ईशानादि मूर्तियोंके अन्तमें 'नमः' जोड़कर ही बोलना चाहिये, अन्यथा नहीं। द्वितीय बीजसे लेकर नवम बीजतकके जो आठ बीज हैं, वे आठ विद्येश्वररूप हैं। उनके नाम ये हैं—अनन्तेश, सूक्ष्म, शिवोत्तम, एकमूर्ति, एकरूप, त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डी—ये आठ विद्येश्वर कहे गये हैं। शिखण्डीसे लेकर अनन्तेशपर्यन्त विलोम-क्रमसे बीजमन्त्रोंका सम्बन्ध जोड़ना चाहिये^२ (यही प्रासाद-मन्त्रका 'क्षय' नामक भेद है।) इस तरह यहाँ मूर्ति-विद्या बतायी गयी॥ २६—३४॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सकलादि मन्त्रोंके उद्धारका वर्णन' नामक तीन सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१७॥
तीन सौ अठारहवाँ अध्याय
अन्तःस्थ, कण्ठोष्ठ तथा शिवस्वरूप मन्त्रका वर्णन; अघोरास्त्र-मन्त्रका उद्धार; 'विघ्नमर्द' नामक मण्डल तथा गणपति-पूजनकी विधि
**भगवान् शिव कहते हैं—**स्कन्द! जिसके ऊपर तेज (र्) हो, ऐसे विश्वरूप (ह्)-को उद्धृत करके फिर नरसिंह (क्ष्)-के नीचे कृतान्त (म्) रखे। उसके अन्तमें 'प्रणव' लगा दे। ऐसा कर 'र्हक्ष्मों' बना। इसके बाद ऊहक (ऊ), अंशुमान् (ं) तथा विश्व (ह्)-को संयुक्त करे। इससे 'हूं' बनेगा। ये दोनों क्रमशः अन्तःस्थ और कण्ठोष्ठ कहे गये हैं। [(र्) अन्तःस्थ वर्ण आदिमें होनेसे उस पूरे मन्त्रकी 'अन्तःस्थ' संज्ञा हुई है। दूसरे मन्त्रमें ह् कण्ठ स्थानीय है और ऊकार ओष्ठस्थानीय; अतः उसे 'कण्ठोष्ठ' नाम दिया गया है।] इनके अन्तमें 'नमः' जोड़ देनेसे ये दोनों मन्त्र चार अक्षरवाले हो जाते हैं। यथा—'ॐ र्हक्ष्मों नमः। ॐ हूं नमः।' विश्वरूप (हकार) कारण माना गया है। उसे बारह मात्राओंसे गुणित करे। इन बारहमेंसे पाँच ह्रस्व-बीजोंद्वारा पूर्ववत् 'ईशान' आदि पाँच ब्रह्ममूर्तियोंकी पूजा करे और दीर्घात्मक छः बीजोंद्वारा पहलेकी ही भाँति यहाँ अङ्गन्यासका कार्य सम्पन्न करे॥ १—३॥
[अब अघोरास्त्र^३-मन्त्रका उद्धार करते हैं—] 'ह्रीं' लिखकर दो बार 'स्फुर-स्फुर' लिखे।
^१. **यथा—**ओम् ईशानाय नमः। ईं तत्पुरुषाय नमः। व्यं अघोराय नमः। व्यं वामदेवाय नमः। नें सद्योजाताय नमः॥ अङ्गन्यासका क्रम इस प्रकार है—आं हृदयाय नमः। ॐ शिरसे स्वाहा। मं शिखायै वषट्। पं कवचाय हुम्। ओम् नेत्रत्रयाय वौषट्। ओं आं ईं ॐ न्यं मं न्यं पं नें ओम् अस्त्राय फट्। इसी क्रमसे करन्यास भी कर सकते हैं।
^२. **यथा—**आं शिखण्डिने नमः। ईं श्रीकण्ठाय नमः। ॐ त्रिमूर्तये नमः। न्यं एकरूपाय नमः। मं एकमूर्तये नमः। इत्यादि।
^३. अग्निपुराणकी उपलब्ध पुस्तकें लिखावट या छपाईके दोषसे 'अघोरास्त्र-मन्त्र' पूरा व्यक्त नहीं कर पाती हैं। 'श्रीविद्यार्णवतन्त्र'के अनुसार किंचिन्मात्र संशोधनसे मन्त्र स्पष्ट हो जाता है; अतः यहाँ शुद्ध पाठ दिया गया है।