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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 693, कुल 878 में से

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पृष्ठ 693

६६६ * अग्निपुराण *


पदोंसे युक्त नाम बोलकर पूजन करे। मन्त्र इस प्रकार है—‘शाश्वताय योगपीठसंस्थिताय नित्ययोगिने ध्यानाहाराय नमः। ॐ नमः शिवाय सर्वप्रभवे शिवाय ईशानमूर्धाय तत्पुरुषाय पञ्चवक्त्राय।’ स्कन्द! तत्पश्चात् ‘सद्’ नामक पूर्वदलमें नौ पदोंसे युक्त शिवका पूजन करे॥ २५-२६॥

‘अघोरहृदाय वामदेवगुह्याय सद्योजातमूर्तये ॐ नमो नमः। गुह्यातिगुह्याय गोप्त्रेऽनिधनाय सर्वयोगाधिकृताय ज्योतीरूपाय’॥ २७। १॥

अग्निकोणवर्ती ईशतत्त्वमें तथा दक्षिणदिशावर्ती विद्यातत्त्वमें ‘परमेश्वराय अचेतनाचेतन व्योमन् व्यापिन्नरूपिन् प्रमथतेजस्तेजः।’—इस मन्त्रसे परमेश्वर शिवकी अर्चना करे॥ २७। २॥

नैर्ऋत्यकोणवर्ती मायातत्त्व तथा पश्चिमदिग्वर्ती कालतत्त्वमें निम्नाङ्कित मन्त्रद्वारा पूजन करे—

‘ॐ धृ धृ वां वां अनिधान निधनोद्भव शिव सर्व परमात्मन् महादेव सद्भावेश्वर महातेज योगाधिपते मुञ्च मुञ्च प्रमथ प्रमथ ॐ सर्व सर्व ॐ भव भव ॐ भवोद्भव सर्वभूतसुखप्रद॥’ २८-३०॥

वायुकोण तथा उत्तरवर्ती दलोंमें स्थित नियति एवं पुरुष—इन दोनों तत्त्वोंमें निम्नाङ्कित नौकी पूजा करे—

‘सर्वासान्निध्यकर ब्रह्मविष्णुरुद्रपरानर्चितास्तुत स्तुत साक्षिन् साक्षिन् तुरु तुरु पतङ्ग पतङ्ग पिङ्ग पिङ्ग ज्ञान ज्ञान। शब्द शब्द सूक्ष्म सूक्ष्म शिव शिव सर्वप्रद सर्वप्रद ॐ नमः शिवाय ॐ नमो नमः शिवाय ॐ नमो नमः’॥ ३१॥

ईशानवर्ती प्राकृततत्त्वमें ‘शब्द’ से लेकर ‘नमः’ तकका मन्त्र पढ़कर पूजन, जप और होम करे। यह ‘रुद्रशान्ति’ ग्रहबाधा, रोग आदि तथा त्रिविध पीडाका शमन करनेवाली तथा सम्पूर्ण मनोरथोंकी साधिका है॥ ३२॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें ‘रुद्रशान्ति-विधान-कथन’ नामक तीन सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२४॥


तीन सौ पचीसवाँ अध्याय

रुद्राक्ष-धारण, मन्त्रोंकी सिद्धादि संज्ञा तथा अंश आदिका विचार

महादेवजी कहते हैं— स्कन्द! शैव-साधकको रुद्राक्षका कड़ा धारण करना चाहिये। रुद्राक्षोंकी संख्या विषम हो। उसका प्रत्येक मनका सब ओरसे सम और दृढ़ हो। रुद्राक्ष एकमुख, त्रिमुख या पञ्चमुख—जैसा भी मिल जाय, धारण करे। द्विमुख, चतुर्मुख तथा षण्मुख रुद्राक्ष भी प्रशस्त माना गया है। उसमें कोई क्षति या आघात न हो—वह फूटा या घुना न होना चाहिये। उसमें तीखे कण्टक होने चाहिये। दाहिनी बाँह तथा शिखा आदिमें चतुर्मुख रुद्राक्ष धारण करे। इससे अब्रह्मचारी भी ब्रह्मचारी तथा अस्नातक पुरुष भी स्नातक हो जाता है। अथवा शिव-मन्त्रकी पूजा करके सोनेकी अँगूठीको दाहिने हाथमें धारण करे॥ १-३॥

शिव, शिखा, ज्योति तथा सावित्र—ये चार ‘गोचर’ हैं। ‘गोचर’ का अर्थ ‘कुल’ समझना चाहिये। उसीसे दीक्षित पुरुषको लक्ष्य करना चाहिये। शिवकुलमें प्राजापत्य, महीपाल, कापोत तथा ग्रन्थिक—ये चार गिने जाते हैं। कुटिल, वेताल, पद्म और हंस—ये चार ‘शिखाकुल’में परिगणित होते हैं। धृतराष्ट्र, वक, काक और गोपाल—ये चार ‘ज्योति’ नामक कुलमें समझे जाते हैं। कुटिका, साठर, गुटिका तथा दण्डी—ये चार ‘सावित्री-कुल’में गिने जाते हैं। इस प्रकार एक-एक कुलके चार-चार भेद हैं॥ ४-६½॥

अब मैं ‘सिद्ध’ आदि अंशोंकी व्याख्या