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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 696, कुल 878 में से

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पृष्ठ 696
  • अध्याय ३२७ * ६६९

सौ आहुतियाँ देकर पूर्णाहुति प्रदान करनेवाला साधक सम्पूर्ण सिद्धियोंका भागी होता है। फिर बलि अर्पित करके तीन या आठ कुमारियोंको भोजन करावे। पूजाका नैवेद्य शिवभक्तोंको दे, स्वयं अपने उपयोगमें न ले। इस प्रकार अनुष्ठान करके कन्या चाहनेवालेको कन्या और पुत्रहीनको पुत्रकी प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यवाली स्त्री सौभाग्यशालिनी होती है। राजाको युद्धमें विजय तथा राज्यकी प्राप्ति होती है। आठ लाख जप करनेसे वाक्सिद्धि प्राप्त होती है तथा देवगण वशमें हो जाते हैं। इष्टदेवको निवेदन किये बिना भोजन न करे। बायें हाथसे भी अर्चना कर सकते हैं। विशेषतः अष्टमी, चतुर्दशी तथा तृतीयाको ऐसा करनेकी विधि है॥ १९—२२$\frac{१}{२}$॥

अब मैं मृत्युंजयकी पूजाका वर्णन करूँगा। कलशमें उनकी पूजा करे। हवनमें प्रणव मृत्युंजयकी मूर्ति है और 'ओं जूं सः।'—इस प्रकार मूलमन्त्र है। 'ओं जूं सः वौषट्।'—ऐसा कहकर अर्चनीय देवता मृत्युंजयको कुम्भमुद्रा दिखावे। इस मन्त्रका दस हजार बार जप करे तथा खीर, दूर्वा, घृत, अमृता (गुडुची), पुनर्नवा (गदहपूर्ना), पायस (पयःपक्व वस्तु) और पुरोडाशका हवन करे। भगवान् मृत्युंजयके चार मुख और चार भुजाएँ हैं। वे अपने दो हाथोंमें कलश और दो हाथोंमें वरद एवं अभयमुद्रा धारण करते हैं। कुम्भमुद्रासे उन्हें स्नान कराना चाहिये। इससे आरोग्य, ऐश्वर्य तथा दीर्घायुकी प्राप्ति होती है। इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित औषध शुभकारक होता है। भगवान् मृत्युंजय ध्यान किये जानेपर दुर्मृत्युको दूर करनेवाले हैं, इसलिये उनकी सदा पूजा होती है॥ २३—२७॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'गौरी आदिकी पूजाका वर्णन' नामक तीन सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२६॥


तीन सौ सत्ताईसवाँ अध्याय

विभिन्न कर्मोंमें उपयुक्त माला, अनेकानेक मन्त्र, लिङ्ग-पूजा तथा देवालयकी महत्ताका विचार

भगवान् महेश्वर कहते हैं—कार्तिकेय! व्रतेश्वर और सत्य आदि देवताओंका पूजन करके उनको व्रतका समर्पण करना चाहिये। अरिष्ट-शान्तिके लिये अरिष्टमूलकी माला उत्तम है। कल्याणप्राप्तिके लिये सुवर्ण एवं रत्नमयी, मारणकर्ममें महाशङ्खमयी, शान्तिकर्ममें शङ्खमयी और पुत्रप्राप्तिके लिये मौक्तिकमयी मालासे जप करे। स्फटिकमणिकी माला कोष-सम्पत्ति देनेवाली और रुद्राक्षकी माला मुक्तिदायिनी है। उसमें आँवलेके बराबर रुद्राक्ष उत्तम माना गया है। मेरुसहित या मेरुहीन माला भी जपमें ग्राह्य हैं। मानसिक जप करते समय मालाके मणियोंको अनामिका और अङ्गुष्ठसे सरकाना चाहिये। उपांशु जपमें तर्जनी और अङ्गुष्ठके संयोगसे मणियोंकी गणना करे; किंतु जपमें मेरुका कभी उल्लङ्घन न करे। यदि प्रमादवश माला गिर जाय, तो दो सौ बार मन्त्रजप करे। घण्टा सर्ववाद्यमय है। उसका वादन अर्थ-सिद्धि करनेवाला है। गृह और मन्दिरमें शिवलिङ्गकी, गोमय, गोमूत्र, वल्मीक-मृत्तिका, भस्म और जलसे शुद्धि करनी चाहिये॥ १—६॥

कार्तिकेय! 'ॐ नमः शिवाय'—यह मन्त्र सम्पूर्ण अभीष्ट अर्थोंको सिद्ध करनेवाला है। वेदमें 'पञ्चाक्षर' और लोकमें 'षडक्षर' माना गया है। परम अक्षर ओंकारमें शिव सूक्ष्म वटबीजमें वटवृक्षके समान स्थित हैं। शिवके क्रमशः 'ॐ नमः शिवाय'—'ईशानः सर्वविद्यानाम्' आदि