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भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

पृष्ठ 698, कुल 878 में से

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पृष्ठ 698

* अध्याय ३३० * ६७१

तीन सौ उनतीसवाँ अध्याय

गायत्री आदि छन्दोंका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—वसिष्ठ! (गायत्री छन्दके आठ भेद हैं—आर्षी, दैवी, आसुरी, प्राजापत्या, याजुषी, साम्नी, आर्ची तथा ब्राह्मी) 'छन्द' शब्द अधिकारमें प्रयुक्त हुआ है, अर्थात् इस पूरे प्रकरणमें छन्द-शब्दकी अनुवृत्ति होती है। 'दैवी' गायत्री एक अक्षरकी, 'आसुरी' पंद्रह अक्षरोंकी, 'प्राजापत्या' आठ अक्षरोंकी, 'याजुषी' छः अक्षरोंकी, 'साम्नी' गायत्री बारह अक्षरोंकी तथा 'आर्ची' अठारह अक्षरोंकी है। यदि साम्नी गायत्रीमें क्रमशः दो-दो अक्षर बढ़ाते हुए उन्हें छः कोष्ठोंमें लिखा जाय, इसी प्रकार आर्ची गायत्रीमें तीन-तीन, प्राजापत्या-गायत्रीमें चार-चार तथा अन्य गायत्रियोंमें अर्थात् दैवी और याजुषीमें क्रमशः एक-एक अक्षर बढ़ जाय एवं आसुरी गायत्रीका एक-एक अक्षर क्रमशः छः कोष्ठोंमें घटता जाय तो उन्हें 'साम्नी' आदि भेदसहित क्रमशः उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् और जगती छन्द जानना चाहिये। याजुषी, साम्नी तथा आर्ची—इन तीन भेदोंवाले गायत्री आदि प्रत्येक छन्दके अक्षरोंको पृथक्-पृथक् जोड़नेपर उन सबको 'ब्राह्मी-गायत्री', 'ब्राह्मी-उष्णिक्' आदि छन्द समझना चाहिये। इसी प्रकार याजुषीके पहले जो दैवी, आसुरी और प्राजापत्या नामक तीन भेद हैं, उनके अक्षरोंको पृथक्-पृथक् छः कोष्ठोंमें जोड़नेपर जितने अक्षर होते हैं, वे 'आर्षी गायत्री', 'आर्षी उष्णिक्' आदि कहलाते हैं। इन भेदोंको स्पष्टरूपसे समझनेके लिये चौंसठ कोष्ठोंमें लिखना चाहिये ॥ १–५॥

(कोष्ठक इस प्रकार है—)

छन्दगायत्री के अक्षरउष्णिक् के अक्षरअनुष्टुप् के अक्षरबृहती के अक्षरपङ्क्ति के अक्षरत्रिष्टुप् के अक्षरजगती के अक्षर
१ आर्षी२४२८३२३६४०४४४८
२ दैवी
३ आसुरी१५१४१३१२१११०
४ प्राजापत्या१२१६२०२४२८३२
५ याजुषी१०१११२
६ साम्नी१२१४१६१८२०२२२४
७ आर्ची१८२१२४२७३०३३३६
८ ब्राह्मी३६४२४८५४६०६६७२

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'छन्दस्सारका कथन' नामक तीन सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३२९॥


तीन सौ तीसवाँ अध्याय

'गायत्री' से लेकर 'जगती' तक छन्दोंके भेद तथा उनके देवता, स्वर, वर्ण और गोत्रका वर्णन

अग्निदेव कहते हैं—इस प्रकरणकी पूर्ति होनेतक 'पादः' पदका अधिकार (अनुवर्तन) है। जहाँ गायत्री आदि छन्दोंमें किसी पादकी अक्षर-संख्या पूरी न हो, वहाँ 'इय्', 'उव्' आदिके द्वारा उसकी पूर्ति की जाती है। (जैसे 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' में आठ अक्षरकी पूर्तिके लिये 'वरेण्यम्' के स्थानमें 'वरेणियम्' समझ लिया जाता है। 'स्वःपते' के स्थानमें 'सुवःपते' माना जाता है।) गायत्री छन्दका एक पाद आठ अक्षरोंका होता है। अर्थात् जहाँ 'गायत्रीके